गेंहू की खेती
(A) भूपरिष्करण क्रिया
- एक गहरी जुताई करें. साथ ही रोटावेटर उपलब्ध होने पर रोटावेटर का उपयोग करें।
- 2 हेरोईग करें
- जुताई इस प्रकार करें जिससे मृदा पूरी तरह भुरभुरी हो जाए। बीज के आकार से छोटा मृदा का कण होना चाहिए।
(B) खाद तथा उर्वरक का प्रयोग
- कम्पोस्ट या नाडेप या गोबर खाद का प्रयोग 15 टन (150 क्विंटल) प्रति हेक्टेयर की दर से करें। इस खाद का प्रयोग खरीफ मौसम से पूर्व गर्मी में ही किया जाय तो ज्यादा उपयुक्त होगा।
- 100 किग्रा रॉक फास्फेट या फास्फोरत्त युक्त खाद (Phosphate rich manure) का प्रयोग करें। 15 टन नाडेप एवं 100 किलोग्राम रॉक फॉस्फेट को डिकम्पोस करने के बाद मृदा में प्रयोग करें।
- 2 किग्रा PSB (Phosphorus Solubilizing Bacteria/फास्फोरस घोलक जीवाणु) का प्रयोग प्रति हेक्टेयर की दर से करें।
- जमीन में जिंक की कमी होने पर या जिन खेतों में धान बोया गया हो वहाँ 20 किलो जिंक सल्फेट प्रति हेक्टेयर आखरी जुताई के समय मृदा में मिला दें।
- उपरोक्त सभी का प्रयोग अंतिम जुताई के पूर्व करें।
(C) बुवाई का समय
- आंशिक सिंचाई उपलब्ध होने पर गेहूँ की बुवाई अक्टूबर के दूसरे पखवाडे में करें।
- सिंचित गेंहूँ की बुवाई नवम्बर के प्रथम सप्ताह या 15 नवम्बर तक करें।
- 15 दिसम्बर के बाद बोवनी करने पर फसल का उत्पादन संतोषजनक नहीं होता है।
D) बीज उपचार
- एक हेक्टेयर खेत के लिए 100 किलोग्राम बीज को 15 लीटर बीजामृत व 500 ग्राम ट्राईकोडरमा विरिडी से उपचारित करें।
- बीज उपचार के बाद बीज को छाया में सुखा लें।
- बीज को पुनः एजेटोवेक्टर एवं पी. एस. बी द्वारा उपचारित करें जिसके लिए प्रति हेक्टेयर 100 किलो बीज के लिए 500 ग्राम एजेंटोबेक्टर एवं 500 ग्राम पी. एस. बी का प्रयोग करें।
- बीज को छाया में सुखा लें एवं उपचारित बीजों की 6 से 8 घंटे के अंदर बोवनी कर दें।
(E) बीज बोवाई की दूरी
- लाईन से लाईन की दूरी 22.5 से.मी. रखें।
- आंशिक सिंचित कृषि की स्थिति में लाईन से लाईन की दूरी 15 से 18 से. मी. रखें।
- बीज बोने की गहराई 5 से 7.5 सें. मी. रखें।
(F) अंतरवर्ती फसल
गेहूँ के साथ में निम्न फसलों को अंतरवर्ती फसल के रूप में उगाया जा सकता है।
- गेंहूँ + राजगीरा + सरसों = 12:1:1
- गेंहूँ की 12 लाईनों के बाद राजगीरा की 1 लाईन एवं सरसों की 1 लाईन लगाते है।
- गेंहूँ + सरसों / चना 2:2 (आंशिक सिंचाई की दशा में) आंशिक सिंचाई की दशा में गेंहूँ की 2 लाइनों के बाद सरसों या चने की 2 लाईन लगाते है।
(G) किस्में
- आंशिक सिंचित क्षेत्र के लिए मालवशक्ति, मालवराज, MP3269, JW3288
- सिंचित क्षेत्रों के लिए एवं रस्ट प्रतिरोधी किस्म JW1201
- सामान्य दशाओं के लिए किस्में: MP4010, JW1203, JW1215, MP1255
- देरी से बोने के लिए उपयुक्त किस्म-JW1203
(H) फसल चक्र
| S.N. | खरीफ | रबी | जायद |
| 1 | दलहन फसल | गेहूँ + अंतरवर्ती फसल | मूँग |
| 2 | छोटे अनाज वाली फसल + अंतरवर्ती फसल | चना + अंतरवर्ती फसल | |
| 3 | दलहन फसल | गेहूँ + अंतरवर्ती फसल | मूँग |
(I) खरपतवार प्रबंधन
- बोवाई के 20 से 25 दिन बाद निंदाई गुड़ाई करें।
- 35 से 45 दिन बाद होईंग करें।
- वर्षा आधारित स्थानों में दो निंदाई गुड़ाई पर्याप्त होती है।
(J) सिंचाई प्रबंधन
ढाल के विपरीत बोवाई करें। छोटी-छोटी क्यारियों बनाएँ। सिंचाई के दौरान 4 उंगल से ज्यादा पानी खेत में नहीं भरना चाहिए।
गेहूँ के लिए मुख्यतः 6 सिंचाइयों की आवश्यकता होती है।
| पहली सिंचाई | मुख्य जड बनते समय | बुवाई के 20 से 25 दिन बाद |
| दूसरी सिंचाई | कल्ले फूटते समय | बुवाई के 40 से 45 दिन बाद |
| तीसरी सिंचाई | गाँठ बनने की अन्तिम अवस्था | बुवाई के 70 से 75 दिन बाद |
| चौथी सिंचाई | फूल आने के समय | बुवाई के 90 से 95 दिन के बाद |
| पाँचवी सिंचाई | दूध बनने के समय | बुवाई के 110 से 115 दिन बाद |
| छटी सिंचाई | दाना सख्त पड़ते समय | बुवाई के 120 से 125 दिन बाद |
एक सिंचाई उपलब्ध होने पर
| पहली सिंचाई | सी आर आई/कल्ले निकालने की अवस्था | बुवाई के 20 से 25 दिन बाद |
दो सिंचाई उपलब्ध होने पर
| पहली सिंचाई | सी आर आई | बुवाई के 20 से 25 दिन बाद |
| दूसरी सिंचाई | फूल आने के समय | बुवाई के 90 से 95 दिन के बाद |
तीन सिंचाई उपलब्ध होने पर
| पहली सिंचाई | सी आर आई | बुवाई के 20 से 25 दिन बाद |
| दूसरी सिंचाई | गाँठ बनने की अन्तिम अवस्था | बुवाई के 70 से 75 दिन बाद |
| तीसरी सिंचाई | दूध बनते समय | बुवाई के 110 से 115 दिन बाद |
(K) उर्वरक प्रबंधन
आवश्यक उर्वरक की मात्रा ज्ञात करने के लिए निम्न सूत्र का प्रयोग करे
- नाइट्रोजन = (4.61 X लक्षित पैदावार या उत्पादन का लक्ष्य) – जमीन में उपलब्ध नाइट्रोजन
- फास्फोरस = (6.96 × लक्षित पैदावार या उत्पादन का लक्ष्य) – जमीन में उपलब्ध फास्फोरस
- पोटाश = (2.67 × लक्षित पैदावार या उत्पादन का लक्ष्य) – जमीन में उपलब्ध पोटाश
- उपरोक्त सूत्र द्वारा मृदा के लिए आवश्यक उर्वरकों की मात्रा ज्ञात कर सकते हैं।
25 से 30 क्विटल गेंहू की पैदावार लेने के लिए 120 किलोग्राम नाइट्रोजन प्रति हेक्टेयर, 60 किलोग्राम फास्फोरस प्रति हेक्टेयर एवं 30 किलोग्राम पोटाश प्रति हेक्टेयर डालने की आवश्यकता होती है।
नाइट्रोजन की एक तिहाई (1/3) मात्रा बुवाई के पहले बीज के नीचे एवं बची हुई दो तिहाई मात्रा (2/3) दो से तीन बार में बाली निकलने की अवस्था से पहले डालें।
(L) समन्वित कीट नियंत्रण (IPM)
- कीटों के प्रभावी नियंत्रण के लिए खेत में नियमित निगरानी की जानी चाहिए एवं कीटों की आर्थिक क्षति स्तर की गणना की जानी चाहिए।
- खेत में चारो ओर सरसों वर्गीय फसल बार्डर के रूप में या अंतरवर्तीय फसल के रूप में गेंहू के साथ ली जानी चाहिए।
- एफीड्स के नियंत्रण के लिए पीले चिपचिपे ट्रेप का प्रयोग करें। फसल की 15 से.मी. की उँचाई पर ट्रेप का प्रयोग किया जाना चाहिए।
- थ्रिप्स के नियंत्रण के लिए नीले चिपचिपे ट्रैप का प्रयोग प्रति एकड़ 4 से 5 की दर से करें।
- एफीड्स एवं थ्रिप्स का अधिक प्रकोप होने पर 15 लीटर गोमूत्र, 2 किलो गाय का गोबर, 15 किलो कुटी हुई नीम की पत्तियों को 100 लीटर पानी में 3 से 5 दिन तक सड़ाकर एवं छानकर स्प्रे करें।
- एफीड्स एवं थ्रीप्स के नियंत्रण के लिए अधिक उँची फसलें जैसे मक्का, ज्वार, बाजरा इत्यादि का प्रयोग बार्डर क्रॉप के रूप में किया जा सकता है।
- दीमकों के नियंत्रण के लिए निम्न उपाय किए जा सकते है।
- गर्मी में गहरी जुताई करें।
- गर्मी में 10 दिन के अन्तर से 3 बार हल से जुताई दीमकों की संख्या को कम करती है।
- 300 कि.ग्रा. नीम की खली का प्रयोग बुवाई के समय करें।
- फसल को देरी से बोने से बचना चाहिए एवं समय के साथ फसल की बोवनी हो जानी चाहिए।
- कच्ची कम्पोस्ट खाद (undecomposed) एवं कच्ची गोबर खाद का प्रयोग खेतों में नहीं किया जाना चाहिए। इस तरह की खादें दीमकों के प्रकोप को अधिक बढ़ा देती है।
- दीमकों के घर (termitaria) एवं रानी दीमक को नष्ट कर देना चाहिए।
- किसी भी तरह के फसल अवशेष एवं खरपतवारों के अपशेषों को खेत से नष्ट करते रहना चाहिए क्योंकि ये कई प्रकार के कीटों के लिए प्रजनन एवं संदुषण का मुख्य साधन होते है।
- प्रति एकड़ भूमि में चार जगह गड्ढ़े बनाकर उनमें मक्का के भुट्टे बीज निकले हुए या 10 स्थानों पर 500 ग्राम गाय का कच्चा गोबर रख देते है, जब यहाँ पर दीमक एकत्र हो जाते हैं तब उन्हें केरोसीन या तेल डालकर नष्ट कर देते हैं।
- दीमक प्रभावित खेतों में सिंचाई करने पर भी दीमकों को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है।
- नेमाटोड नियंत्रण
- नेमाटोड्स एवं ईयर कोकल बीमारी से बचाव के लिए बीजों को 2 प्रतिशत नमक के घोल में डुबाना चाहिए जिससे प्रभावित बीज हल्के होने के कारण पानी के उपर आ जाते है जिन्हें बाहर निकाल दिया जाता है।
- गर्मी में खेत की गहरी जुताई की जानी चाहिए जिससे नेमाटोड्स एवं मृदा जनित बीमारियों के जीवाणु तेज धूप में आकर नष्ट हो जाते हैं।
- चूहों का नियंत्रण
- होर्स ग्राम के आटे को सीमेंट के साथ मिलाकर गोलियों बना ली जाती है। चूहों द्वारा इसे खाये जाने पर उनके मलद्वार को यह अवरूद्ध कर देता है जिससे उनकी मौत हो जाती है। चूहों द्वारा मल त्याग ना कर पाने की स्थिति में उनमें तनाव उत्पन होता है जिससे वे आपस में लड़ाई करते है और वे भागने के लिए मजबूर हो जाते है।
- . मुट्ठी भर गेहूँ को Gliricidia sepium की छाल के साथ उबालते हैं, गेंहू को कपड़े में बाँधकर उबाला जा सकता है। एवं रात भर इसे सड़ने दिया जाता है। इसे गेंहूँ को चूहों के विरुद्ध जहर की तरह इस्तेमाल किया जा सकता है।
(M) समन्वित बीमारी नियंत्रण (IDM)
- गर्मी के समय बीजो को एक घंटे के लिए पानी में भिगाएँ एवं इन्हें धूप में सुखा लें।
- उचित अन्तराल पर फसल चक्र का प्रयोग करने से भी कई प्रकार की बीमारियों को नियंत्रित किया जा सकता है।
- मृदा को स्वस्थ बनाए रखने के लिए बीमारी रहित बीज का प्रयोग करें।
- लूज स्मट के नियंत्रण के लिए गर्म पानी द्वारा बीजोपचारः- बीजों को 30℃ गर्म पानी में 4 से 6 घंटे तक भिगा कर रखते है। बाद में बीजों को 49°C पर 2 मिनट के लिए रखते है। इसके बाद बीजों को पॉलीथीन शीट पर सुखा लिया जाता है।
- बीमारियों द्वारा ग्रस्त पौधों को खेतों से निकालकर नष्ट कर देना चाहिए। स्मट द्वारा ग्रस्त पौधों को निकालते समय यह ध्यान रखना चाहिए कि स्पोर स्वस्थ पौधों पर नही गिरने पाए।
- Pseudomonas fluorescens 75 मि.ली प्रति 15 लीटर पानी में मिलाकर स्प्रे करें।
- रस्ट का नियंत्रण
- देरी से पकने वाली जातियों की बोवाई समय के साथ करें एवं बोने में देर नहीं करें।
- मिश्रित फसल एवं फसल चक्र अपनाए।
- नाइट्रोजन का अधिक उपयोग नहीं करें।
- खेत को खरपतवारों से मुक्त रखें।
- 5 लीटर बटरमिल्क को 200 लीटर पानी में मिलाकर स्प्रे करें।
- हिल बन्ट एवं करनाल बन्ट का नियंत्रण
- बीजों का 5 प्रतिशत वर्मीवॉश से बीजोपचार करें।
- रोग प्रतिरोधक फसलों का फसल चक्र में प्रयोग करें।
- बीज दर को कम रखें एवं लाईन से लाईन की दूरी अधिक रखें।
- प्रत्येक वर्ष गेंहूं की फसल ना लें एवं दो फसलों मध्य एक तीसरी फसल लें।
- बालियाँ निकलते समय अधिक मात्रा में सिंचाई ना करें।
- 1 किग्रा सरसों का आटा एवं 5 लीटर बटरमिल्क को 100 लीटर पानी में मिलाकर स्प्रे करें।
- नई किस्मों जोकि रोग प्रतिरोधी हो उन्हें प्रयोग में लेना चाहिए।
(N) फसल कटाई पूर्व सावधानियाँ
- फसल की कटाई सही समय पर एवं बीज झड़ने के पूर्व, पक्षीयों एवं मौसम द्वारा नुकसान होने के पूर्व होनी चाहिए एवं भंडारण के पूर्व सही प्रकार से सुखा लेना चाहिए।
- गहाई के समय बीजों को टूटने से बचाना चाहिए क्योंकि क्षतिग्रस्त बीज भंडारण के समय फंगस निर्माण एवं कीटों को आकर्षित करते है एवं बीजों का बाजार मुल्य भी कम हो जाता है। अतः गहाई करते समय बीजों में नमी लगभग 12 प्रतिशत के आसपास होनी चाहिए।