मिश्रित फसलें
मिश्रित फसलों की परिभाषा
एक ऋतु में एक ही खेत में एकसाथ दो या दो से अधिक फसलों का उगाना ही मिश्रित फसल कहलाता है। फसल उत्पादन की इस प्रणाली में एक ही समय में एक खेत में दो या दो से अधिक फसलें एक साथ बोई जाती हैं। जिन क्षेत्रों में प्राकृतिक प्रकोप, जैसे- सूखा पड़ना, बाढ़ आना, पाला पड़ना व ओला पड़ना आदि सामान्य है, वहाँ पर यह पद्धति अपनाते हैं। सस्य मिश्रण के निम्नलिखित प्रकार (Types) है
(1) मिश्रित फसलें (Mixed crops)-
इस वर्ग के मिश्रण की फसलों के बोने, पकने तथा काटने का समय लगभग एक ही होता है। बोने से पूर्व सभी फसलों के बीज एक जगह मिलाकर छिड़ककर अथवा कतारों में खेत में बुआई कर देते हैं। उदाहरण के रूप में, गेहूँ + चना, गेहूँ + मटर, गेहूँ + सरसी, गेहूँ + जौ, चना + सरसों, चना + तारामिरा, मक्का + उर्दू, ज्वार + उर्दू, ज्वार + लोबिया आदि इस श्रेणी के मुख्य सस्य मिश्रण है। इस विधि में अनेक कृषि क्रियाओं के सम्पादन एवं फसलों की कटाई आदि में समस्या उत्पन्न होती है।
(2) सहचर या सहयोगी फसलें (Companion or subsidiary crops)-
इस वर्ग में दोनों फसले के बीज बोने से पहले एक साथ नहीं मिलाते बल्कि अलग-अलग पंक्तियों में बोते हैं। जैसे सरसों की दो कतारों के बीच 5 पंक्तियों गेहूँ की। अरहर + ज्वार + चना इसमें अरहर की पंक्तियाँ 3 मीटर की दूरी पर बोते हैं, अरहर की दो पंक्तियों के बीच खरीफ में ज्वार व रबी में चना उगा लेते हैं। तारामिरा की दो पंक्तियों के बीच चने की 4-5 पंक्तियाँ बोना, अरहर की दो पंक्तियों के बीच उर्द या मूंगफली की 5-6 पंक्तियाँ बोना, मक्का या कपास की दो पंक्तियों के बीच उर्दू या मूँग की एक-एक कतारों का बोना आदि इस वर्ग के मुख्य सस्य मिश्रण है। इस प्रकार फसले बोने से, निकाई-गुड़ाई, कटाई आदि कृषि क्रियायें आसानी से कर सकते हैं। दोनों फसलों के पौधों की उचित दूरी होने के कारण उनकी अच्छी वृद्धि होती है।
(3) रक्षक या सीमांत फसलें (Guard or Outer or Border crop)-
इस विधि में मुख्य फसल को सुरक्षा हेतु, उसके चारों ओर 10-15 पंक्तियाँ गौण फसल की बो देते हैं जैसे गन्नों के चारों ओर सन, जूट, पटसन, अरहर, कुसुम, मक्का, ज्वार या ढेंचा आदि की बुआई करना।
(4) सहायक अथवा वृद्धिकारक फसलें (Augmenting crops)-
इस वर्ग के मिश्रण में मुख्य फसत की उपज बढ़ाने के लिये अन्य गौण फसलें उसके साथ मिला दी जाती हैं। उदाहरण के लिये बरसीम की फसल के साथ सरसों को बोते हैं। पहली कटाई के समय बरसीम बहुत छोटी होती है, तब तक सरसों की काफी वृद्धि हो जाती है। इस प्रकार बरसीम की पहली कटाई के साथ भी काफी उपज मिल जाती है। फसल उत्पादन की इस प्रणाली में एक ही समय में एक खेत में दो या दो से अधिक फसलें एक साथ बोई जाती है। जिन क्षेत्रों में प्राकृतिक प्रकोप जैसे सूखा पड़ना, बाढ़ आना, पाला पड़ना व ओले पड़ना आदि सामान्य है वहां पर यह पद्धति अपनाते हैं। इस प्रकार की कृषि में कई कृषि क्रियाओं के सम्पादन एवं फसलों की कटाई आदि में समस्या उत्पन्न होती है।
(5) मध्यवर्ती या अन्त:. फसलोत्पादन (Inter-cropping)-
भूमि से अधिक आय प्राप्त करने के लिये बागानी फसलों या ऐसी फसले जिनमें पंक्ति से पंक्ति का फासला अधिक होता है, पंक्तियों के बीच में कम अवधि की अन्य फसलें उगाना, अंत: फसल या मध्यवर्ती फसल कहलाता है; जैसे – गन्ने के बीच में बसन्त में मूँग या लोबिया व गन्ने की शरद ऋतु में बोई गई फसल में गेहूँ व आलू आदि उगाना। अन्तःफसली खेती में आधार फसल अथवा मुख्य फसल (Main or base crop) की प्रति इकाई क्षेत्र पौधों की संख्या, अकेली मुख्य फसल के समान ही रखते हैं जबकि घटक फसल (Component crop). मुख्य फसल के बोच उगाते हैं।
अन्तः फसलोत्पादन (Inter-Cropping) के सिद्धान्त
- साथ में उगाई जाने वाली फसल, सहायक (Complementary) प्रभाव रखे न कि प्रतियोगितात्मक (Competitive) प्रभाव।
- सहायक फसल मुख्य फसल की तुलना में कम अवधि में तेजी से बढ़वार करने वाली होनी चाहिये ताकि मुख्य फसल के प्रारम्भिक धीमी गति के वृद्धिकाल का उपयोग कर सके। सहायक फसल उस समय तक कट जानी चाहिये जब तक कि मुख्य फसल अपनी वृद्धि प्रारम्भ करती है। जैसे- अरहर के साथ तिल, सावां, मूंग व उर्द आदि। अरहर में शाखाएँ सितम्बर में निकलना प्रारम्भ होती हैं, तब तक मूँग व उर्द आदि अपना जीवन चक्र पूरा कर लेती हैं। इसी प्रकार शरदकालीन गन्ना अंकुरण के बाद फरवरी तक सुषुप्तावस्था में रहता है। इस बीच गेहूँ, आलू, सरसों, बरसीम व लूसर्न इसमें सहायक फसल के रूप में उगाया जा सकता है।
- सहायक फसलों की कृषि क्रियाएँ, मुख्य फसल के समान होनी चाहिए।
- सीधी बढ़ने वाली मुख्य फसलों के साथ, भूमि पर फैलकर चलने वाली आच्छादित (Cover) फसलें, जैसे-मूंग, उर्द, लोबिया आदि उगानी चाहिए जो कि भूमि को कटाव से बचाती है. मृदा नमी की वाष्पीकरण द्वारा होने वाली हानि को रोकती हैं एवं खरपतवारों की वृद्धि को रोकती हैं।
- सहायक फसल, मुख्य फसल की तुलना में कम या अधिक भूमि की गहराई से पोषक तत्त्व, नमी व ऑक्सीजन का उपयोग करे।
- मुख्य फसल के पौधों की संख्या इष्टतम रखें जबकि सहायक फसलों के पौधों की संख्या परिस्थितियों के अनुसार कम या अधिक कर सकते हैं।
- मुख्य फसल व सहायक फसलों के रोग व कीट एक समान न हो।
अन्तः फसल (Inter crop) एवं मिश्रित फसल (Mixed crop) में अन्तर
| क्रमांक | अन्तः फसल | मिश्रित फसल |
|---|---|---|
| 1 | इन फसलों के उगाने का मुख्य उद्देश्य दो पंक्तियों के बीच के स्थान का उपयोग करना है | इन फसलों का मुख्य उद्देश्य प्राकृतिक प्रकोप जैसे सूखा, बाढ़ एवं पाला इत्यादि से कम से कम एक फसल प्राप्त करना है। |
| 2 | अधिक ध्यान मुख्य फसल पर दिया जाता है अर्थात मुख्य फसल की कीमत पर सहायक नहीं उगाते हैं । इस प्रकार मुख्य एवं सहायक फसल में आपसी कोई प्रतियोगिता नहीं होती है। | यहाँ पर दोनों फसलों पर समान रूप से ध्यान देते हैं। कोई भी मुख्य एवं सहायक फसल नहीं होती है। अधिकांशतः दोनों फसलों में प्रतियोगिता हो सकती है |
| 3 | सहायक फसल, मुख्य फसल की अपेक्षा कम अवधि की होती है एवं पहले ही सहायक फसल की कटाई हो जाती है। | अधिकांशतः दोनों फसलों की अवधि समान होती है अतः एकसाथ ही दोनों फसलें काटी जाती है। |
| 4 | दोनों फसलें पंक्तियों में बोते है। मुख्य फसल सहायक फसल से पहले भी बोई जा सकती है। | दोनों फसलें एक समय पर ही पंक्तियों या छिटकवा विधि से बोई जाती है। |
अन्तः फसल उत्पादन को निम्न वर्ग में बाटते हैं
(1) सहयोग फसलोत्पादन (Companion cropping)-
इसके अन्दर एक फसल दूसरी फसल की उपज को प्रभावित नहीं करती अर्थात् प्रत्येक फसल, शुद्ध फसल (Pure crop) की तरह ही उपज देती है। दोनों फसलों में पौधों की संख्या प्रत्येक इकाई क्षेत्र शुद्ध फसल के समान ही रखी जाती है, जैसे-शरदकालीन गन्ने में आलू, गेहूँ या सरसों आदि।
(2) सहक्रियावादी फसलोत्यादन (Synergistic cropping)-
दो फसलों को साथ उगाने परः यहां पर दोनों फसलों की अलग-अलग उपज; दोनों फसलों को अलग अलग शुद्ध फसल के रूप में उगाने की अपेक्षा अधिक प्राप्त होती है। जैसे शरदकालीन गन्ना + आलू ।
6. पोषक फसल (Nurse crop)
मिश्रित सहयोगी फसल जो मुख्य फसल को, नाइट्रोजन स्थिरीकरण से नाइट्रोजन प्रदान करती है या जीवांश पदार्थ प्रदान करती है। जैसे अनाज वाली फसलों (मक्का, ज्वार व बाजरा) या फल वृक्षों के बीच लोबिया या ग्वार का उगाना।
7. समान्तर फसलें (Parallel crops)
मक्का के साथ मूंग, उर्द व लोबिया की कम अवधि की जातियों को उगाना ही समान्तर खेती है। इन फसलों से मक्का की उपज पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है। इसी प्रकार कपास में मूंग, उर्द या सोयाबीन उगाते हैं। इसी प्रकार अरहर के साथ मूंग, उर्द, लोबिया, मूँगफली, सोयाबीन, मक्का, ज्वार, बाजरा व सूरजमुखी आदि उगा लेते हैं।
8. बहुमंजिली खेती (Multi-stories of tier cropping)-
भूमि के किसी निश्चित क्षेत्र पर निश्चित समय में, अलग-अलग ऊँचाई की कई फसलें एक साथ बोना, बहुमंजिली खेती कहलाता है। इस प्रकार को खेती में भूमि-जल व भूमि क्षेत्र का उपयोग बहुत ही दक्षता व आर्थिक होता है। जैसे- नारियल + काली मिर्च + पाइन एपिल + घासें अथवा यूकेलिपटिस + पपीता + बरसीम अथवा मक्का के साथ तिल या कांगनी + मूंग या उर्द या मूंगफली।