कीट नियंत्रण की विधियाँ

सामान्य-आधुनिक खेती में, फसलों की उन्नत जातियों, सिंचाई की उचित व्यवस्था तथा खाद एवं उर्वरकों के समुचित प्रबन्ध के साथ-साथ, फसलों की कीट-पतंगों से रक्षा करना आवश्यक है। कीट-पतंगे फसलों में औसत 5-50% तक उत्पादन को कम कर देते हैं। फसलों को हानि पहुँचाने वाले-पतंगों में कुछ कीट-पतंगे, अधिकतर एक-दूसरे से भिन्न पौधों पर आक्रमण करते हैं। इन्हें पोलीफेगस (Polyphagous) कहते हैं। कोट-पतंगों के रहन-सहन की, भोजन करने की व अन्य आदतों में काफी भिन्नता पाई जाती है। कुछ कीट-पतंगे भूमि में रहते हैं और पौधे के भूमि वाले अंगों को खाते हैं। कुछ कीट-पतंगे भूमि से ऊपर रहते हैं और पौधे के कोमल अंगों पत्तियों आदि को खाते हैं। कुछ कीट-पतंगे पौधों की कोशिकाओं का रस ही चूसते हैं। कुछ कीट-पतंगे पत्तियों, तनों, जड़ों, फलों आदि में सूराख (Bores) करके अपने जीवन की विभिन्न अवस्थाएँ (Stages) गुजारते हैं। इसके अतिरिक्त कुछकीट संग्रहालयों (seed storage) में अन्न को ही हानि पहुंचाते हैं।

कीट नियन्त्रण की विधियाँ (Methods of Insect Control)

खेतों व भण्डार गृहों में कीट-पतंगों के नियन्त्रण की विभिन्न विधियाँ निम्न प्रकार हैं-

(A) कृषिक या सस्य वैज्ञानिक विधियाँ

(B) भौतिक विधियाँ

(C) जैविक विधियाँ

(D) रासायनिक विधियाँ।

(A) कृषिक या सस्य वैज्ञानिक (Cultural or Agronomical) विधियाँ
कीट-पतंगों का नियन्त्रण कृषिक विधियों से करने के लिये कृषक को कीट-पतंगों की आदतों की जानकारी होना आवश्यक है। इस प्रकार हम कीट-पतंगे की उस नाजुक अवस्था का पता लगा लेते हैं, जहाँ पर उसे आसानी से निम्न कृषि विधियों द्वारा नियन्त्रित कर सकते हैं।
(1) उचित फसल चक्र यदि हम प्रतिवर्ष या प्रत्येक मौसम में एक ही फसलः जैसे- गन्ना, सोयाबीन, धान, सूर्यमुखी, गेंहू, चना आदि उगाते हैं तो कीट-पतंगों की संख्या बढ़ती रहती है, क्योंकि उन्हें लगातार भोजन प्राप्त होता रहता है। अतः दलहन के बाद अन्न अथवा हेर फेर में फसल उगाना कीटों को नियन्त्रित करता है। उदाहरण के लिये दीमक की जहाँ समस्या हो वहाँ पर गन्ने, गेहूँ व मक्का के स्थान पर तम्बाकू, प्याज व लहसुन उगाना चाहिये। कुछ फसल चक्र मक्का आलू तम्बाकू, मक्का-आलू-प्याज धान-मटर-मक्का आदि फसल चक्र कीट नियन्त्रण में काफी सहायक हैं।
(2) मिश्रित फसलों (Mixed cropping) का उगाना जब दो फसलें एकसाथ मिलाकर बोते हैं तो फसल का कीट, अपने मेजबान (Host) फसल पर पहुंचने में बाधा महसूस करता है।
(3) कीट रोधक फसलों की किस्मों का प्रयोग क्षेत्र विशेष में फसल पर लगने वाले मुख्य कीट-पतंगों की रोधक किस्मों का प्रयोग करना चाहिये। स्वस्थ एवं कीटरहित बोजों की ही बुआई करें
(4) निराई-गुड़ाई निराई-गुडाई करके खेत से खरपतवारों को नष्ट करें। मक्का, ज्वार एवं धान आदि में वेधक (Borers) का नियन्त्रण इससे होता है। पौधे के गले सड़े भाग को निकालने से भी कीट-पतंगों का आक्रमण कम होता है।
(5) जुताई (Tillage)- जुताई से कीट-पतंगों के प्यूपा भूमि की सतह पर आ जाते हैं जहाँ पर वे पक्षियों द्वारा भोजन के रूप में उपयोग में ले लिये जाते हैं अथवा उनमें पानी की कमी (Dehydration) होकर वे नष्ट हो जाते हैं। प्यूपा या लारवा जुताई के कारण भूमि में नीचे की सतहों में भी पहुंच सकते हैं और इनका बाहर निकलना फिर आसानी से नहीं होता। गर्मियों की जुताई कीट-पतंगों के नियन्त्रण में अधिक महत्त्वपूर्ण है। चने के कटवाएं, केटरपीलर, टिड्डी (Locust) व ग्रास होपर, अंडे तथा दीमक के घर (Nest) जुताई से नष्ट होते हैं।
(6) बुआई व कटाई के समय में परिवर्तन वसंत ऋतु में गन्ने की अगेती बुआई करने पर तना छेदक का आक्रमण फसल पर कम होता है। तराई में मक्का की वसंत में, फरवरी से पहले बुआई करने पर ज्वार तना मक्खी का आक्रमण होता है। बरसीम व अन्य चारे की फसलों की तुरन्त कटाई करके साइलेज बनाना चाहिये, इससे फसलों पर कीट-पतंगों का आक्रमण कम होता है।
बुआई का समय, मक्का की बुआई देर से करने पर, वेधक (Borer) का कम आक्रमण होता है क्योंकि इस कीट के अंडे का परजीजी (ट्राइकोग्रामा), वेधक को कम करता है। शरदकालीन मक्का में बेधक कीट सुषुप्तावस्था में चला जाता है। धान की रोपाई 15 जून से पूर्व करने पर बेधक का प्रकोप घटता है। अगेती कपास की जातियों पर, कपास के गुलाबी कीट का कम प्रकोप होता है।
(7) पोषण डिसआर्डर (Nutritional Disorder)- फसल में इष्टतम मात्रा में पोषक तत्व न मिलने पर, कीट-पतंगों का आक्रमण होने की सम्भावना बढ़ती है। गन्ने की फसल में नाइट्रोजन की कमी होने पर गन्ने की सफेद मक्खी का प्रकोप बढ़ता है। गन्ने में नाइट्रोजन की मात्रा अधिक देने पर, तने कोमल होने के कारण पाइरिला का प्रकोप बढ़ जाता है। पौधे जो उचित मात्रा में पोषक तत्व प्राप्त करते हैं, स्वस्थ होते हैं एवं कीट-पतंगे व रोगाणु से अच्छी प्रकार मुकाबला कर लेते हैं। जैविक मृदा सुधारकों (Soil amendments) जैसे लकड़ी का बुरादा, भूसा, कटे हुए तने के टुकड़ों आदि के प्रयोग से सूत्रकृमि (Nematodes) भूमि में नियन्त्रित होते हैं। अनेक फसलों में नीम की खली, अलसी की खली, अंडी की खली, सरसों की खली व महुए की खली के प्रयोग से सूत्रकृमि नियन्त्रित होते हैं।
नाइट्रोजन उर्वरकों के प्रयोग से अमोनिया बनती है जो कि मृदा समु को 8.5 से ऊपर उठा देती है, जो मृदा कीट-पतंगों के लिये हानिकारक होती है।
(8) सफाई (Sanitation) व खरपतवार नष्ट करना- खेत में सूखी पत्तियाँ, डंठल व खरपतवार आदि की समय-समय पर सफाई करनी चाहिये। इससे कीट-पतंगों को खेत में छिपने की कम जगह मिलती है। कपास के खेत से कूड़ा करकट नष्ट करने से पिंकवाल वार्म के लारवा नष्ट हो जाते हैं। धान के खेत से पेड़ों की पास छीलने (Scraping) से प्रासहोपर के अंडे नस्ट होते हैं। मक्का के खेत में फसल अवशेष हटाने पर छेदकों की संख्या कम होती है। गन्ने में सूखी पत्ती तने से उखाड़ने पर, पाइरिला के अंडे नष्ट होते हैं।
(9) कीट आकर्षक फसलों का प्रयोग कपास के खेत के चारों ओर भिडी की फसल उगाने से कपास के जेसिड भिंडी पर इकट्ठे होते हैं। कपास के चारों ओर अरहर की फसल उगाने से ग्रे विविल अरहर पर एकत्रित होते हैं। जब कीट-पतंगे आकर्षक फसल पर एकत्रित हो जायें तो कीट आकर्षक फसल को पूर्णतया नष्ट कर देना चाहिये।
(10) सिचाई का प्रवन्ध (Water management) गन्ने के खेत में पानी भरने पर गन्ने की सफेट मक्खी नष्ट होती है। गन्ने में मई जून में सिंचाई करने से तना बेधक का आक्रमण कम होता है। सिंचाई से दीमक का आक्रमण भी कम होता है।
स्वच्छ व कीट-पतंगों रहित बीज की ही बुआई करनी चाहिए, फसल के पौधों पर अगर कीट-पतंगों का आक्रमण हो तो प्रभावित भाग की कटाई-छंटाई (Pruning), पंक्तियों के बीच उचित अन्तरण से भी कीट-पतंगों के आक्रमण से फसल को बचा सकते हैं।
मृदा सतह पर पॉलिथीन की चादर बिछाने से, मृदा ताप बढ़ता है जो अनेक कीट-पतंगों के लिये घातक प्रभाव छोड़ता है।
गन्ने में सफेद मक्खी का आक्रमण अधिक होने पर पैडी (Ratoon) की फसल नहीं लेनी चाहिये। गन्ने में छेदक का आक्रमण होने पर, मार्च से पहले फसल की कटाई कर लेनी चाहिये। दीमक आदि से खेत को बचाने के लिये गोबर के कच्चे खाद का प्रयोग कभी न करें।
कृषि विधियों से कीट-पतंगों के नियन्त्रण से लाभ (Advantage)
(1) अलग से कोई यन्त्र (Equipment) आदि का प्रवन्ध नहीं करना पड़ता।
(2) सबसे साधारण व सस्ती विधि है क्योंकि सस्य वैज्ञानिक क्रियाओं के साथ-साथ ही कीट-पतंगों का नियन्त्रण हो जाता है।
(3) कीट-पतंगों को, उनके जीवन की सबसे कमजोर अवस्था पर इस विधि से नष्ट कर देते हैं।
(4) कीटनाशी रसायनों से होने वाली दुर्घटनाएँ व कीटनाशी दवाओं का खाद्य पदार्थों पर पड़ने वाले अवशेष (Residual) प्रभाव से बचा जा सकता है।
(B) यान्त्रिक व भौतिक (Mechanical and Physical) विधियाँ
किसी क्षेत्र में जब फसल पर जब कीटों की संख्या कम होती है, ये विधियों अपनाई जाती हैं। इसमें प्रमुख विधियाँ निम्न प्रकार हैं-
(अ) कीट-पतंगों को विविध जीवन अवस्थाओं में एकत्र करके नष्ट करना इनमें कीटों को हाथों से कुचलना, हापर डोजर का प्रयोग करना व नैट (Net) की सहायता से कीट पतंगों को पकड़कर नष्ट करना चाहिये। गन्ने के तने अगोलों के कन्सुएँ (Borers) को तार की सहायता से, तने में घुमाकर नष्ट कर सकते हैं। सामान्य अनाज एवं दल्हनी फसलों को जैसे धान, चना इत्यादि में रस्सी की सहायता से कीटों नस्ट कर सकते हैं।
(व) खाई खोदना (Trenching)- विभिन्न प्रकार के लारवा (Larvae) वा सुंडी को एक खेत से दूसरे खेत में जाने से रोकने के लिये खेतों के चारों ओर खाई खोदकर और खाइयों में पानी भरकर मिट्टी का तेल मिला देना चाहिये।
(स) ट्रेप (Trap) का प्रयोग करके ट्रेप में कीट-पतंगों को लाने के लिये कई विधियाँ काम में लाई जाती हैं, जैसे-
(1) यांत्रिक ट्रेप (Mechanical Trap)- इस प्रकार के ट्रेप फेरोमोन ट्रेप, हापरडोजर व हापर कैचरः प्रमुख हैं। ये डोजर या कैचर एक डिब्बे के आकार के होते हैं। इनमें जल मिश्रित मिट्टी का तेल भरा होता है। कीट-पतंगे इनमें गिरकर नष्ट हो जाते हैं। जबकि फेरोमोन ट्रेप में विभिन्न प्रकार की मादा कीट की सुगंध वाली टिकिया होती है जिसमे नर कीट आकर्षित होकर फस जाते हैं।
(2) चिपचिपे ट्रेष (Sticker trap) विशेष रूप से सब्जियों, फल वाले वृक्षों को कीट-पतंगों के आक्रमण से बचाने के लिये प्रयोग किये जाते हैं। कई प्रकार की सब्जियों और दल्हनी फसलों में पीले और बैंगनी रंग के चिपचिपे ट्रेप के प्रयोग से कई प्रकार से कीटों की रोकथाम की जा सकती है। आम के वृक्षों का मीली बग (Mealy bug) नामक कीट इस विधि से रोक सकते हैं। चिपचिपे पदार्थों की पट्टी वृक्षों के चारों ओर पोत देते हैं। चार भाग अंडी का तेल में, रोजिन गर्म करके, यह लुगदी (Paste) तैयार करके वृक्षों के चारों ओर पोतते हैं।
(3) प्रकाश आकर्षक ट्रेप (Light trap)- प्रकाश के द्वारा कीटों को एकत्रित किया जाता है और बाद में एकत्रित कीटों को नष्ट कर देते हैं। भिन्न-भिन्न कीट भिन्न प्रकार के प्रकाश से आकर्षित होते हैं। कोटों को नष्ट करने के लिये प्रकाश के नीचे पात्र में पानी व मिट्टी के तेल का मिश्रण भरकर रख देते हैं।
अन्य ट्रेप जैसे किसी पात्र में चारा या कोई सुगंधित वस्तु रखकर कीट-पतंगों को आकर्षित किया जाता है तथा एकत्रित कीटों को नष्ट कर देते हैं।
(द) सूर्य का उपचार संग्राहालयों से अनाज बाहर निकालकर इनकी नमी को धूप में कम करने से संग्रहालय के अनेक कीट पतंगे नस्ट होते हैं। कपास का पिंक बालवार्म एवं अनाज के अनेक कीट-पतंगे 120-130°F पर तीन घंटे में समाप्त हो जाते हैं। कीट-पतंगों को नष्ट करने में कम ताप इतना प्रभावी नहीं है जितना कि अधिक तापक्रम। घार डिबी फारेनहाइट पर कीट अक्रिय हो जाते हैं और 20 से 30°F पर सुषुप्तावस्था में बले जाते हैं। शीतगृह आदि इस उद्देश्य से काम में लाये जाते हैं। परन्तु ये महंगे होते हैं।
(C) जैविक (Biological) विधियाँ
इस विधि में कोट पतंगों को नष्ट करने के लिये, बीमारी के जीवाणु (pathogens), परजीवियों (Parasites) व प्राकृतिक भक्षकों (Natural Predators) का प्रयोग करते हैं। इन परजीवियों व प्राकृतिक भक्षकों को अनुकूल वातावरण प्रदान करके इनकी संख्या बढ़ाते हैं। लेडीबर्ड बीटल नामक कीट-एफिड व स्केल कीटों को भोजन के रूप में लेते हैं। टेकीटिड मक्खी व बर्र नामक परजीवी अधिकतर कीट पतंगों के डिम्ब को व सूंडी (Larvae) को खा जाते हैं। धान में स्ट्रीप्ड बग कीट का नियन्त्रण दक्षिण भारत में बत्तख (Ducks) से करते हैं। केटरपीलर व कट वोर्मस का सामान्य टोड भक्षण करते हैं। आर्मी वोर्म व पोटेटो बीटिल को लिजार्ड नष्ट करते हैं। लाल टिट्टी (Red Locust) को मैनाह चिड़िया (Maynah bird) नियन्त्रित करती है। मच्छर के लारवा जल स्त्रोतों में लारवी साइड मछली द्वारा नष्ट किये जाते हैं। कुछ पक्षी जैसे कौवा आदि भी कीट-पतंगों को भोजन के रूप में खा जाते हैं। एक बार यदि यह विधि सफल हो जाये तो सदैव कीट-पतंगों के आक्रमण से फसल की हानि को बचा सकते हैं
(D) रासायनिक (Chemical) विधियाँ
इस विधि में कीट-पतंगों की रोकथाम विभिन्न कीटनाशी पदार्थों (Insecticides) को प्रयोग में लाकर करते हैं। आजकल कीट-पतंगों को नियंत्रित करने अथवा नष्ट करने के लिये विभिन्न प्रकार के कीटनाशी रसायन उपलब्ध है। इन कीटनाशी रसायनों की प्रक्रिया विधि (Mode of action) व स्तनधारियों के लिये विषैलापन आदि को ध्यान में रखकर, विभिन्न परिस्थितियों में रसायन की छाँट करते हैं।
रासायनिक कीटनाशकों के मनुष्य एवं अन्य जीवों पर होने वाले दुष्प्रभाव को देखते हुए रासायनिक कीटनाशकों का प्रयोग अधिक आवश्यकता होने पर ही किया जाना चाहिए।
कम अवधि, फलों वाली व सब्जियों वाली फसलों के लिये कम समय तक पौधों पर अपना प्रभाव रखने वाले रसायनों का प्रयोग करना चाहिये। कीट-पतंगों के रहन-सहन व भोजन की आदतों के अनुसार भी कीटनाशियों की छाँट करते हैं। तना छेटक (Borers) व चूसने वाले कीट-पतंगों के लिये सिस्टेमैटिक किस्म के रसायन प्रयोग में लाते हैं।
भूमि शोधन अधिक कृषि उत्पादन की दूसरी परम आवश्यकता है, भूमि का उर्वर होना जितना आवश्यक है, उतना ही स्वस्थ एवं कीट/रोग रहित होना भी। भूमि के स्वास्थ्य से कुछ ऐसे कीटों का सम्बन्ध होता है, जो भूमि में रहकर बीजों, नवजात अंकुरों व पौधों की जड़ों अथवा तनों के अधोभूभाग को खा जाते है। जब फसल बोई जाती है, उस समय भी वे कीट (टीमक, कटवर्म, गुजिया आदि) भूमि में होते हैं, परन्तु सरलता से चिह्नित नहीं हो पाते हैं जैसे ही बीज बोये जाते हैं, या अंकुरित होते हैं तो ये कीट आक्रमण कर देते हैं। फलतः आक्रमण की जानकारी होने तक पर्याप्त हानि हो चुकी होती है।