खरपतवारों की रोकथाम
(Methods of Weed Control)
खेतों से खरपतवारों को नष्ट करने के उपायों को निम्नलिखित दो भागों में विभक्त करते हैं-
(अ) निरोधात्मक अथवा प्रतिबन्धक विधियाँ (Preventive Measures)
खरपतवारों का मुये क्षेत्रों में वितरण एवं विस्तार को रोकना ही खरपतवार प्रतिबन्ध (Prevention) कहलाता है। इसके लिये उन साधनों का ज्ञान होना अति आवश्यक है जिनके द्वारा खरपतवारों का वितरण होता है। खेत में खरपतवार, फसलों के बीज, खाद, पानी, हवा, मनुष्य, पशु एवं मशीनों के द्वारा पहुंचते हैं। अतः ध्यान रखना आवश्यक है कि उपर्युक्त साधनों द्वारा खरपतवार बाहर से खेत तक न पहुँचे। खरपतवार यदि एक बार खेत में उग आयें तो उन्हें खेत से नष्ट कर देना सम्भव नहीं होता। अतः यह आवश्यक है कि खेत में खरपतवारों का नये रूप से प्रवेश रोक दिया जाये, जिससे कि बाद में खरपतवारों को खेत में नष्ट करने का अवसर ही न
साधारणतया निम्नलिखित सावधानियों अपनाने से खेतों में बाहर से आने वाले खरपतवारों का प्रवेश
रोका जा सकता है-
(1) खरपतवार-रहित शुद्ध बीज का बोना (Sowing of clean seed) कुछ खरपतवारों के बीज मुख्य फसल के बीजों से आसानी से अलग कर सकते हैं। जैसे गेहूँ, जो व घना आदि से बधुवा, सत्यानाशी आदि के धौजों को आसानी से अलग करके शुद्ध बीज प्राप्त कर सकते हैं, जिनका अलग करना असम्भव होता है, जैसे सरसों के बीज से सत्यानाशी खरपतवार का बीज इस प्रकार के अशुद्ध बीजों का न बोना ही अधिक लाभदायक होता है। शुद्ध बीज प्राप्त करने के लिये खड़ी फसल के किसी निश्चित क्षेत्र से खरपतवारों को उनके बीज बनाने से पहले ही खेत से निकाल देना चाहिये।
बीज की शुद्धता को बनाये रखने के लिये निम्नलिखित सुझाव दिये जा सकते हैं-
(1) सरकार की ओर से बीज के परीक्षणों की. विभिन्न क्षेत्रों में प्रयोगशालायें (Seed testing laboratories) हैं, प्रत्येक विकास खण्डों में बीजों के नमूने एकत्रित किये जायें।
(ii) फसल के शुद्ध बीजों का वितरण सरकार अपने हाथ में ले।
(iii) कृषक महाजनों व मण्डियों से शुद्ध बीज खरीदकर बुआई में प्रयोग करें।
(iv) कृषक स्वयं शुद्ध बीज के बोने व प्राप्त करने में रुचि लें।
(v) शुद्ध बोज सस्ती दरों पर किसानों को उपलब्ध हो।
उपर्युक्त साधनों को अपनाकर शुद्ध बीज की बुआई करके खरपतवारों का खेत में विस्तार करने से रोका जा सकता है।
(2) कृषि में प्रयोग की जाने वाली मशीनें व यन्त्र साफ हों कृषक खेत में कार्य करते समय इस बात का ध्यान नहीं देता कि उसके यन्त्र खेत में जाने से पहले साफ हैं या नहीं। ऐसे खेतों में जहाँ पर खरपतवारों का प्रकोप है, किसान जुताई, निकाई, गुड़ाई करके जब दूसरे खेतों में पहुंचता है तो पहले खेत से खरपतवारों के अंग राइजोम्स, बल्ब, नट, ट्यूबर व तने आदि इन यन्त्रों के द्वारा नये खेतों में छोड़ देता है। अतः इस प्रकार का खरपतवार का प्रवेश कृषक को खेतों से रोकना चाहिये।
(3) सिंचाई की नालियों व नहरों के किनारे उगे हुए खरपतवारों को नष्ट कर दिया जाये पानी के रास्तों के किनारे खड़े खरपतवार अच्छी प्रकार फल-फूलकर पानी के रास्तों में पड़ते हैं और आसानी से खेतों में प्रवेश कर जाते हैं। अतः ऐसी जगहों से खरपतवारों को नष्ट करना अत्यन्त आवश्यक होता है।
(4) पौध लगाने में सावधानी अपनाई जाये कभी-कभी खरपतवारों के पौधे, पौधों के अंग व बीज, पौध की मिट्टी के साथ एक स्थान से दूसरे स्थान पर पहुंच जाते हैं। अतः निरीक्षण काके ही पौष का रोपण दूसरे खेतों में करना चाहिये।
(5) पशुओं को शुद्ध चारा, घास व दाना खिलाया जाये पशुओं के खाने में यदि दाना खिलाया जा रहा है तो दाने को दलकर या उबालकर खिलाना चाहिये। क्योंकि पशु सभी प्रकार के बीजों का पूर्ण पाचन नहीं कर पाते और गोबर के अन्दर ये बीज बिना अपनी अंकुरण शक्ति नष्ट किये, बाहर निकल जाते हैं। जब इस प्रकार के गोबर का प्रयोग खेत में करते हैं तो बाहर से खरपतवारों का प्रवेश भी हो जाता है। कुछ बीज पशु के पाचन संस्थान में अपनी अंकुरण शक्ति को नष्ट कर देते हैं। बीजों की अंकुरण शक्ति का नष्ट होना कई बातों पर निर्भर करता है, जैसे-
(1) पशु की किस्म जो पशु परिश्रम का कार्य करते हैं उनकी पाचन क्षमताः दूध व गोस्त देने वाले पशुओं को अपेक्षा अधिक होती है।
(ii) पशु की आयु जैसे-जैसे पशुओं को आयु बढ़तों है गोबर में खरपतवारों के जीवित बीजों की संख्या भी बढ़ती जाती है क्योंकि आयु बढ़ने पर पाचन शक्ति कम हो जाती है।
(iii) बीजों के प्रकार अलग-अलग किस्म के खरपतवारों के बीजों के ऊपर पशु को पाचन शक्ति का प्रभाव अलग-अलग होता है।
(iv) पशु का बीज के प्रति वाव व खाने की इच्छा पशु जिन खरपतवारों के बीजों को अपनी इच्छा से नहीं खाते तो उनका पाचन भी अच्छी प्रकार नहीं कर पाते।
(v) पशुओं के पाचन संस्थान में बीजों के रहने की अवधि पशुओं के पाचन संस्थान में जो बीज अधिक समय तक रुकते हैं वे अपनी अंकुरण क्षमता को अधिक नष्ट करते हैं।
(6) अच्छी प्रकार के गले-सड़े व शुद्ध खाद का खेतों में प्रयोग किया जाये पदि भली प्रकार से सड़े-गले खाद का प्रयोग खेत में नहीं करते तो खाद के द्वारा अंकुरण क्षमता वाले खरपतवार के बीज खेतों में पहुँच जाते हैं। खाद को गलन व सहन विशेष रूप से खाद की किस्म, खाद को गलने सड़ने में दिये समय व खरपतवार की किस्म पर निर्भर करती है। खाद किस विधि से तैयार किया गया है इस बात का भी गलने सड़ने, बीजों की अंकुरण क्षमता बनाये रखने पर प्रभाव पड़ता है।
(7) पशुओं को ऐसे स्थानों से न गुजरने दिया जाये जहाँ पर खरपतवार उग रहे हों ऐसे क्षेत्रों में वहाँ खरपतवारों का अधिक प्रकोप हो, पशुओं का गुजरना भी लाभप्रद सिद्ध नहीं होता। पशु ऐसे खरपतवारों के विस्तार में मदद करते हैं। कुछ खरपतवारों के बीज पशुओं के शरीर से चिपटकर एक स्थान से दूसरे स्थान पर पहुँच जाते हैं।
(8) खरपतवारों का एक नये क्षेत्र में प्रवेश रोकने के लिये यह आवश्यक है कि सड़कों, रास्ते व बन्जर पड़ी भूनियों के खरपतवारों को नष्ट कर दिया जाये।
(9) ऐसे क्षेत्रों की, जहाँ पर खरपतवार का प्रयोग हो, मिट्टी उठाकर नये क्षेत्रों में नहीं डालनी चाहिये। ऐसा करने से खरपतवार के विस्तार को कम किया जा सकता है।
(ब) चिकित्सात्यक विधियाँ (Curative or Remedial Measures)
खेत के अन्दर स्थापित खरपतवारों की रोकथाम के लिये यह विधि प्रयोग में लाई जाती है। इस विधि के निम्नलिखित दो मुख्य उद्देश्य हैं-
(1) खरपतवारों का उन्मूलन (Eradication of weeds) किसी क्षेत्र से खरपतवारों को पूर्णतया नह करना ही खरपतवारों का उन्मूलन कहलाता है। नई खेती में लाई जाने वाली भूमियों में जहों पर खरपतवारों का प्रकोप होता है. यह विधि अपनाई जाती है। यह विधि अधिक खर्चीली होती है।
(2) खरपतवारों की रोकथाम या नियन्त्रण (Control of weeds) खरपतवारों को विभिन्न विधियों द्वारा खेत में इतना कम कर देना कि मुख्य फसलों को सफलतापूर्वक उगाया जा सके, खरपतवारों का नियन्त्रण या रोकथाम कहलाती है। खरपतवारों को रोकथाम की विधियों को निम्न प्रकार विभक्त करते हैं-
(A) मात्रिक विधियों (Mechanical methods),
(B) कृषिव निधिर्चा (Cultural methods),
(C) जैविक विधियों (Biological methods),
(D) रासायनिक विधियाँ (Chemical methods) |
(A) यान्त्रिक विधियों (Mechanical Methods)
खरपतवारों के नियन्त्रण की इस विधि में यन्त्रों व मशीनों की सहायता ली जाती है। किसी क्षेत्र में खरपतवारों की किरन व सपनता के आधार पर निम्नलिखित विधियों, उनको रोकथाम के लिये प्रयोग करते 1-
(i) खरपतवारों को हाथ से उखाड़ना (Hands pulling)- छोटे-छोटे क्षेत्रों में खरपतवारों को चुन-चुनकर हाथ से उखाड़ देते हैं। यह विधि बड़े क्षेत्रों के उपयुक्त नहीं है। इस विधि से घर पर लान (Lawn), बगीचे व नर्सरी से एकवर्षीय या द्विवर्षीय पौधों को नष्ट करने में सहायता मिलती है। भूमि के अन्दर के सभी खरपतवारों के भाग को उखाड़ना इसकी सफलता का मापदण्ड है। अतः जिन खरपतवारों का जनन वानस्पतिक अंगों से होता है उनको नष्ट करने में इस विधि से सफलता नहीं मिलती।
(ii) हाथ से निकाई-गुड़ाई करना (Hand hocing)- इस विधि में खरपतवारों को नष्ट करने के लिये खुर्ची, फावड़ा व हैंड हो (Hand Hoe) का प्रयोग करते हैं। यह विधि भी उपर्युक्त परिस्थितियों में लाभदायक है।
खुर्ची से निकालना (Spudding)- खरपतवारों को भूमि की सतह के नीचे से काटना खरपतवारों का खुर्ची से निकालना कहलाता है।
(iii) खरपतवारों को काटना (Weed's mowing)- खरपतवारों को नष्ट करने की यह विधि चरागाहों व लान (Lawas) आदि में प्रयोग करते हैं। खरपतवारों को बार-बार नष्ट करने से उनके विभिन्न अंगों में एकत्रित भोज्य पदार्थों का भण्डार समाप्त हो जाता है और खरपतवार नष्ट हो जाते हैं।
(iv) कृत्रिम आवरण का प्रयोग (Mulching)- खरपतवारों का कृत्रिम आवरण के द्वारा वायु एवं प्रकाश से सम्बन्ध तोड़ दिया जाता है। इस प्रकार से खरपतवार नष्ट हो जाते हैं। कृत्रिम आवरण के लिये विशेष रूप से भूसा, सूखी पत्तियाँ, लकड़ी का बुरादा, रेत, कागज, पास, सूखी खोई आदि सामग्री प्रयोग करते हैं। इसके अतिरिक्त पोलीड़बाइलीन कृत्रिम आचरण का प्रयोग भी आजकल होने लगा है। खड़ी फसल में इस विधि से खरपतवारों को नष्ट करने के लिये यह आवश्यक है कि फसलों को पंक्तियों में बोया जाये। कृत्रिम आवरण मृदा में नमी की मात्रा, वाष्पीकरण आदि से नष्ट होने से बचाकर भो मुख्य फसल, की उपज में वृद्धि करती है।
(v) बाढ़ द्वारा खरपतवार नष्ट करना (Flooding)- जिन क्षेत्रों में पानी के साधन उपलब्ध हैं वहाँ पर खेत में खरपतवारों को पानी में कुछ समय तक डुबाकर रखा जाता है। इस प्रकार खरपतवारों के पौधों को श्वसन के लिये ऑक्सीजन व प्रकाश की कमी पड़ती है। अतः पौधे शीघ्र नष्ट हो जाते हैं। गर्मियों में वह विधि अपनाने से पानी का तापक्रम बढ़ने के कारण पौधों की कोशिकाओं का प्रोटोप्लाज्म शीघ्र नह हो जाता है। कम ऊँचाई के एकवर्षीय खरपतवारों को नष्ट करने में इस विधि से अधिक लाभ होता है। ऊऊंचे व बहुवर्षीय खरपतवारों को काटकर बाद में खेत में पानी भरना बाहिये। पानी में किसी प्रकार के लवण नहीं होने चाहिएँ, इससे भूमि क्षारीय हो सकती है।
(vi) आग लगाकर (By Burning)- अधिकतर बहुवर्षीय खरपतवारों को अकृक्षित भूमियों पर नष्ट करने के लिये यह विधि अपनाई जाती है।
(vii) जुताई द्वारा खरपतवारों को नष्ट करना (By Tillage)- खेतों की जुताई करके सभी प्रकार के खरपतवार नष्ट किये जा सकते हैं। जुताई करके भूमि को खुली छोड़ना आवश्यक है जिससे कि वायु व धूप में सूखकर ये खरपतवार शोष नष्ट हो जायें। बहुवर्षीय व जिन खरपतवारों का जनन वानस्पतिक अंगों से होता है, उनको जुताई बार-बार गहरी करनी पड़ सकती है।
(viii) जलीय खरपतवारों को नए करने की याचिक विधियाँ नदी, नालों व नहरों में लगातार सिल्ट (गाद) जमा होने के कारण पानी का बहाव कम होता रहता है। ऐसी परिस्थितियों में जलीय खरपतवार पनपते हैं। तल कर्षण द्वारा गाद को खरपतवार सहित हटाकर पानी का बहाव तेज करके खरपतवार निकाले जाते हैं। यह कार्य एक भारी लोहे की जंजीर द्वारा किया जाता है। इस क्रिया में नहर अथवा नाले के किनारे दोनों ओर दो ट्रैक्टर समान गत्ति से चलते हैं और लोहे की भारी जंओर, नाले या नहर की तलहटी में घसीटते हैं। इससे जलीय खरपतवार कटकर इकट्ठा हो जाते हैं। थोड़ी-थोड़ी दूरी पर मशीन व हाथ से सहारे इन खरपतवारों को बाहर किनारे पर निकाल कर इकट्ठा किया जाता है। बाद में इन्हें सुखाकर नष्ट कर देते हैं।
(B) कृषित अथवा सस्य वैज्ञानिक विधियाँ
(Cultural Methods or Agronomical Methods)
अनेक कृषित क्रियाओं को अपनाकर कृषक खरपतवारों के प्रकोप को काफी सीमा तक कम कर सकता है। इस प्रकार को कृषित क्रियाओं का संक्षेप में वर्णन निम्न प्रकार है-
(1) फसलों की छौट (Selection of crops)- जिन भूमियों पर खरपतवारों का प्रकोप हो वहाँ पर
निम्नलिखित गुणों वाली प्रतियोगी (Competetive) सस्यों का उगाना लाभकारी रहता है-
1. फसल बोने के बादः शीघ्र अंकुरित होती हो व अंकुरण को प्रतिशत भी अधिक हो।
2. फसल कम समय में अधिक वानस्पतिक व जड़ों की वृद्धि करती हो।
3. फसले मृदा को ऊपरी व निचली दोनों सतहों से अपना भोजन प्राप्त कर लेती हो।
4. प्रत्येक कटाई के बाद पुनः शीघ्रता से वृद्धि करती हो।
5. पोषक तत्त्वों की आवश्यकता कम हो।
6. फसल के पौधों के ऊपर अधिक पत्तियों हों व पत्तियों पर क्रियाशील रन्धकूपों (Stomata) की
संख्या अधिक हो।
7. फसल को जल-माँग कम हो।
8: फसल मृदा एवं मौसम की विषमताओं को सहन करने की क्षमता रखती हो।
9. फसल अल्पकालिक (Short duration) हो।
10 फसल कोट-पतंगों व बीमारियों के आक्रमण को सहन करने की क्षमता शक्ति रखती हो।
।। मृटा में अपना कोई हानिकारक प्रभाव न छोड़ती हो।
12. फसल की वानस्पतिक वृद्धि मृदा को सतह से ऊपर ही अधिक हो।
13. फसल का बीज सस्ता व आसानी से प्राप्त हो।
उपर्युक्त सभी गुणों को ध्यान में रखते हुए जी, बरसीम, तुगर्न, प्वार, मक्का, ज्वार, लोथिया व मूंग आदि फसलें खरपतवार की रोकथाम में अधिक उत्तम सिद्ध होती हैं। एकवर्षीय खरपतवारों को नह करने में इनसे अच्छे परिणाम मिलते हैं। बहुवर्षीय खरपतवारों को नष्ट करने के लिये इस विधि के साथ-साथ अन्य विधियों की भी सहायता लेनी होती है।
(2) फसल की जातियों की छाँट (Selection of crop varieties) एक हो फसल को भिन्न-भिन जातियों अपनी वानस्पतिक जड़ों के विस्तार करने की अलग-अलग क्षमता रखती हैं। अतः किसी फसल विशेष की उस जाति का ही चयन करना चाहिये जो कि अधिक प्रतियोगी सिद्ध होती हो।
(3) फसल चळ (Crop rotation) - यदि किसी फसल को बिना फसल चक्र के रखे एक हो खेत में बार-बार उगाते रहते हैं तो विशेष प्रकार के खरपतवार उस खेत में बढ़ जाते हैं। फसलों को फसल चक्र में उगाने से इस प्रकार के खरपतवार की बढ़वार को रोका जा सकता है। एकवर्षीय खरपतवारों की रोकथाम में इस विधि की सहायता अधिक लाभकारी है।
(4) खाद की किस्म (Kind of manures) अधिकतर कम्पोस्ट खाद, हरी खाद व गोबर की खाद आदि का प्रयोग करने से मृदा में वे अपने गलने सड़ने के समय में कार्बनिक अम्ल छोड़ती हैं जो खरपतवारों के राइजोम्स, नट, बल्ब व ट्यूबर आदि की वृद्धि पर प्रतिकूल प्रभाव छोड़ता है। अतः खरपतवारों को वृद्धि को किसी सीमा तक कम किया जा सकता है।
(5) भूमि सुधारकों का प्रयोग (Use of Amendments) - लवणीय, क्षारीय व अम्लोय भूमियों में कैल्शियम सल्फेट (जिप्सम) व कैल्शियम कार्बोनेट (चूना) आदि मृदा सुधारकों का प्रयोग करने से उनकी मृदा समु फसल उत्पन्न करने के उपयुक्त हो जाती है और फसल के पौधे प्रतियोगी सिद्ध होते हैं।
(6) कम जुताई गहरी व बार-बार जुताई कभी-कभी लाभदायक हो सकती है परन्तु गहरी जुताई से सुषुप्त बोज व राइजोम आदि भूमि की ऊपरी सतह पर आकर उपयुक्त परिस्थितियों में अंकुरित हो सकते हैं। अतः गहरी जुताई नहीं करनी चाहिये जिससे कि सभी खरपतवारों के बीज व अन्य प्रजनन अंग ऊपरी सतह में ही बने रहें व एक साथ अंकुरित होने पर आसानी से नष्ट किये जा सकें।
(7) गर्मियों में परती रखना खेतों को अप्रैल से जून तक खाली रखने पर खरपतवारों की जड़े, तने, कन्द, प्रकन्द व बल्ब आदि वानस्पतिक अंग सूखकर नष्ट हो जाते हैं। आजकल सथन खेतों के कारण खेतों को खाली छोड़ना सम्भव नहीं होता और इन खेतों में बहुवर्षीय शाकीय खरपतवार दूब, मोथा, हिरनखुरी आदि पनप सकते हैं। गर्मियों में खरपतवार नियन्त्रण के लिये, सघन खेती में फसलों को कतारों के बीच कम अन्तर रखकर बोना चाहिये।
(8) निस्तेज थीज क्यारी (Stale seed bed) - फसलों की बुआई से पूर्व खेत को 1-2 सिंचाई कर, खरपतवारों को उगाकर, खेत की जुताई कर, खरपतवारों को निस्तेज अथवा नष्ट करना चाहिये। सिचाई करने के बाद भूमि को 4-5 सेमी ऊपरी परत के खरपतवारों के बीज अंकुरित होते हैं इन्हें पैराक्वाट रसायन या अन्य यान्त्रिक विधि (हैरो या बोडर) से इन्हें नष्ट कर देना चाहिये। समय को उपलब्धतानुसर यह क्रिया दोहरा सकते हैं। निस्तेज बीज क्यारी तैयार करने का प्रमुख लाभ यह है कि फसल के बीज खरपतवार रहित वातावरण में अंकुरित होते हैं। गेहूँ, बरसीम व लुसर्न आदि फसलों के लिये यह विधि उपयुक्त है। खरीफ में असमय वर्षा के कारण, फसलों को बुआई में देर हो सकती है। अत. कभी-कभी यह विधि लाभदायक नहीं रहती।
(9) फसलों के बोने का समय (Sowing time of crops)- किसी फसल विशेष या उसको किसी जाति विशेष को खेत में बोने का कोई निश्चित समय होता है। अगर इस निश्चित समय से हटकर फसल बोई जाती है तो उस समय फसल की बढ़वार कम व देर में होती है। अतः खरपतवारों के बढ़ने की सम्भावना बढ़ जाती है। कभी-कभी किसी खरपतवार विशेष को नष्ट करने के लिये यदि खेत में फसल बोने से 10-15 दिन पहले पलेवा कर दें, तो वे खरपतवार उग आते हैं। उगे हुये खरपतवारों को जुताई द्वारा नष्ट करके, बाद में, फसल का बोना लाभकारी होता है। गेहूँ की देर से बुआई करने पर बथुआ, जंगली जई व मंडूसी खरपतवारों का प्रकोप बहुत कम होता है।
(10) बीज की दर एवं पंक्तियों व पौधों की पारस्परिक दूरी (Seed rate and spacing between
rows and plants)- ऐसी फसलें जिनमें वानस्पतिक वृद्धि अधिक होतो हो, कम बोज दर व अधिक फासला पौधों व कतारों के बीच रखना चाहिये। इसके विपरीत जिन फसलों की वानस्पतिक वृद्धि कम होती हो उनको बुआई में बीज की मात्रा अधिक व पंक्तियों व पौधों का फासला कम रखना चाहिये। यदि बीज की अंकुरण क्षमता कम हो तो बीज दर बढ़ा देनी चाहिये। फसल की निश्चित समय से देर में बुआई करते समय भी बीज की दर बढ़ा देनी चाहिये। ये सब क्रियायें अधिक से अधिक वानस्पतिक फैलाव खेत में करके खरपतवारों के पौधों को प्रकाश एवं वायु में बंचित करती है। अतः खरपतवार वृद्धि नहीं कर पाते।
(11) बोने की दिशा (Direction of sowing) फसल के बोने की दिशा का फसल के द्वारा खेत
पर पड़ने वाली छाया पर प्रभाव पड़ता है। अतः अलग-अलग ऋतुओं में खेत के अन्दर फसल को उसी दिशा में बोना चाहिये जिससे कि खेत में अधिक से अधिक समय तक छाया बनी रहे। इस प्रकार खरपतवारों को प्रकाश प वायु की अनुपस्थिति में प्रकाश संश्लेषण की क्रिया का अवसर समाप्त हो जाता है और खरपतवार नष्ट हो जाते हैं। 93
(12) बोने की विधि रबी की फसले चना, मटर आदि की बुआई, वर्षा ऋतु की सुरक्षित नमी के आधार पर 5-7 सेमी गहरे नमी के क्षेत्र में करते हैं। ऊपरी 3-4 सेमी सतह सूखी व खुरदरी होने के कारण, खरपतवार के बीज अंकुरित नहीं हो पाते व फसल के बीज उग आते हैं। गर्मियों में कुंडों में फसल की बुआई करना, खरपतवार समस्या को कम करता है, क्योंकि इन दिनों में सिचाई का पानी कुंडों तक ही सीमित करके चलते हैं और दो कतारों के बीच सूखा स्थान छूटने के कारण, खरपतवार के बीज अंकुरित नहीं हो पाते। जय फसल पूर्ण विकसित हो जाये तो पूरे खेत की सिंचाई की जा सकती है। हल द्वारा बुआई प्रारम्भ में खरपतवार फसल प्रतियोगिता को कम करने में सहायक है।
(1.3) फसल मृदा जल प्रवन्ध जिन फसलों को अधिक पानी चाहिये वहाँ पर सिचाई का उचित प्रबन्ध हो व जिन फसलों को कम पानी चाहिये वहाँ पर जल निकास का उचित प्रबन्ध होना चाहिये। ऐसा प्रबन्ध होने पर फसल अधिक ओजपूर्ण व प्रतियोगी सिद्ध होती है। रोरित धान की फसल में पडलिग करने व खेत में पानी भरा रखने के कारण, खरपतवारों का प्रकोप कम होता है। चरागाहों में जल निकास का उचित प्रबन्ध होना चाहिये। फसल के पौधे 10-15 सेमी ऊँचे होने पर प्रथम सिंचाई करें। ऐसा करने पर प्रथम सिचाई के बाद अंकुरित होने वाले खरपतवारों को फसल के पौधे दबाकर चलते हैं। खरपतवार के पौधे में 2-3 पत्तियों निकलते ही भारी सिंचाई करें। इससे मृटा वायु में कमी होने के कारण, अधिकतर खरपतवार श्वसन के अभाव में नष्ट हो जाते हैं। यह विधि कुछ फसलों तक ही सीमित है। परती खेतों में इस विधि को अपनाकर खरपतवार नष्ट कर सकते हैं। जलीय व नम क्षेत्रों, धान के खेत, सिंचाई की नालियों, नहरों, पोखरों व तालाबों में इन क्षेत्रों की जल निकासी करके, सूखा रखकर, खरपतवारों को नष्ट कर सकते हैं। धान के खेत में बाढ़ व जल निकास एकान्तरित समयान्तर पर करने से अधिकतर खरपतवार नष्ट हो जाते हैं।
(14) खेत में सिंचाई करने के लिये बनाई गई नालियों व मेड़ों का कम करना चूंकि खरपतवार के बीज भूमि की ऊपरी सतह में होते हैं। अतः जब मेड़ बनाते हैं, तो बीज का एकत्रीकरण मेड़ों पर हो जाता है और इनके ऊपर खरपतवार खुद पनपते हैं व खेत में फैलते रहते हैं। अतः जहीं तक हो सके खेत को समतल कर लिया जाये ताकि खेत में कम-से-कम मेड़ व सिचाई की नालियाँ बनानी पड़े। कम मेड़ बनने के कारण, कुल कृषि क्षेत्र भी खेत में बढ़ जाता है। प्लास्टिक की मेड़ भी काम में ला सकते हैं।
(15) कृषक क्रियायें प्रत्येक फसल में बिना किसी समय को नष्ट किये, फसल की किस्म के अनुसार, बुआई के 15-30 दिन बाद प्रथम व आवश्यकता पड़ने पर 10-15 दिन बाद दूसरी निराई कर देनी चाहिये। इस समय खरपतवार अपनी वृद्धि करते हैं। अतः वृद्धिकाल अर्थात् क्रान्तिक अवस्था पर हो खरपतवारों को नष्ट कर देना चाहिये। शुष्क क्षेत्रों में खरपतवार फसल के साथ अंकुरित नहीं होते अतः वहाँ पर बुआई के 45-50 दिन बाद निराई करना लाभदायक है।
(16) कटाई की विधि (Method of harvesting) कटाई की कुछ विधियों में फसल के जड़ व तनों को खेत में पूर्णतया समाप्त कर दिया जाता है। अगर जड़ व तने का कोई हिस्सा काटकर खेत में छोड़ दिया जाये तो वह कृत्रिम आवरण का कार्य करके, खरपतवारों की बढ़वार को कम कर सकता है। जिस विधि में खेत्त पूर्णतया खाली छोड़ दिये जाते हैं वहाँ पर खरपतवार की बढ़वार होने की सम्भावना अधिक होतो है। बरसीम, आदि की फसलें जो कई कटाई देती हैं उनकी कटाई का समय व संख्या आदि का ध्यान रखना भी खरपतवार की बढ़वार को रोक सकता है। चरागाहों में क्रमिक (Rotation) चराई से खरपतवार नियन्चित होते हैं।
(C) जैविक विधियाँ (Biological Methods)
कृषकों को इस विधि को जानकारी हमारे देश में अभी तक अधिक नहीं है। इस विधि को अपनाने से क्षेत्र में पाये जाने वाले खरपतवारों की रोकथाम की जा सकती है। खरपतवारों को नष्ट करने के लिये इस विधि में कीट-पतंगों व जीवाणुओं तथा अनेक प्रकार की वनस्पति का प्रयोग किया जाता है। इस विधि को
प्रयोग में लाने से पहले निम्नलिखित बातों का ध्यान रखना आवश्यक होता है। अर्थात् बायो एजेन्ट को छाँट निम्न आधार पर करनी चाहिये-
(1) सबसे प्रमुख बात जिसको ध्यान रखना होता है वह कीट-पतंगों व रोग के कीटाणुओं की किस्म को छॉटना होता है। कीट इस आदत के हों कि वह जिस विशेष खरपतवार के लिये छाटे गये हैं केवल उसी को खाकर जिन्दा रहें। अगर कीट अन्य फसल के पौधों पर भी अपना जोवन निर्वाह कर लेते हैं तो खरपतवार की रोकथाम इस प्रकार के कीटों से सम्भव नहीं है। कोट जिस किसी विशेष कुल के पौधों पर आश्रित हो उसकी फसल के पौधे उस क्षेत्र में नहीं बोने चाहिए।
(2) जिस क्षेत्र-विशेष में खरपतवार को नष्ट करने के लिये कोई कीट-विशेष छाँटा गया है, उस क्षेत्र में उस कोट के अन्य शत्रु नहीं होने चाहिए अन्यचा ये कॉट शत्रु इस लाभदायक कोट को समाप्त कर खरपतवार की रोकथाम नहीं होने देंगे।
(3) जिस कोट का चयन किया गया है वह क्षेत्र की जलवायु, मौसम व भूमि आदि की प्रतिकूलताओं को सहन करने की क्षमता रखता हो, जिससे कि वे अपने उद्देश्य को सफल बना सके तथा अपना प्रजनन काफी कर सकें।
(4) जैविक साधनों के प्रयोग में, फसल को कोई हानि नहीं होनी चाहिये।
खरपतवार के प्राकृतिक शत्रुओं (Bioagent) के प्रकार खरपतवारों को नियन्त्रित करने के लिये निम्न बायो एजेन्ट काम में लिये जाते हैं-
(1) कीट-पतंगे खरपतवारों को नष्ट करने में मुख्यतया डिप्टेरा, कोलियोप्टेरा, हेमीप्टेरा, लेपिडोप्टेरा एमीमाइजा, घेक्ला व क्रोसीडोसेमा आदि जाति के कोट-पतंगों का प्रयोग किया जाता है।
(2) कशेरुको प्राणी (Vertebrates) निम्न क्षेत्रों में इनका प्रयोग होता है-
(3) रोगजनक (Pathogens)- वायरस (विषाणु), जीवाणु (bacteria) व फफूंदी का खरपतवारों के
क्षेत्र में निषेचन करके खरपतवार नष्ट करते हैं।
(4) प्रतियोगी (Competetive plants) अनेक प्रतियोगी बनस्पति खरपतवारों को नष्ट करने के काम में आते हैं। पौधों के परजीवियों (Parasites) का प्रयोग भी खरपतवार नियन्त्रण के लिये करते हैं। कीटों और रोगजनकों के कारण खरपतवार के पौधों में बोज उत्पादन प्रायः बन्द हो जाता है। कोट, सूक्ष्म जीव, पौधों की पत्तियों को प्रभावित कर प्रकाश संश्लेषण की क्रिया को कम कर अन्त में पूर्णतया रोक देते हैं, अतः पौधों को जीवन चलाने के लिये कार्बोहाइड्रेट्स नहीं मिल पाते।
जैविक विधियों के लाभ (Advantages)
(1) इस विधि से ऐसे खरपतवार भी नियन्त्रित किये जा सकते हैं जो रासायनिक या अन्य विधियों से नियन्त्रित नहीं हो पाते।
(2) यह एक स्थायी विधि है अन्य विधियों की भांति इसे दोहराने की आवश्यकता नहीं होती।
(3) इस विधि के द्वारा एकवर्षीय खरपतवारों की अपेक्षा बहुवर्षीय खरपतवारों एवं कृषित क्षेत्रों को अपेक्षा अकृषित क्षेत्रों के खरपतवारों का नियन्त्रण, अधिक प्रभावी ढंग से किया जा सकता है।
जैविक विधियों की सीमायें (Limitations)
भारतवर्ष में जैविक विधियों अपनाने में निम्न समस्याओं का सामना करना पड़ता है-
(1) यहाँ पर जोतो (Holdings) का आकार छोटा होता है अतः थोड़े ही क्षेत्र में अलग किस्म को फसलों की बुआई की जाती है जो इस विधि के अपनाने में बाधा है।