वर्मी कम्पोस्ट या केंचुआ पालन
वर्मी कम्पोस्ट को वर्मी कल्चर या केंचुआ पालन भी कहा जाता है। कार्बनिक पदार्थ जैसे गोबर, सूखे एवं हरे पत्ते, घास फूस, धान का पुआल, बाजरा की कड़वी, खेतों के अवशेष, मुर्गीपालन से प्राप्त अवशेष इत्यादि खाकर केंचुओं द्वारा प्राप्त मल से तैयार खाद ही वर्मी कम्पोस्ट कहलाती है। यह हर प्रकार के पेड़-पौधों फल वृक्षों, सब्जियों वाली फसलों, सभी अनाज एवं दलहन-तिलहल फसलों के लिए उपयोगी खाद है। साथ ही पर्यावरण एवं मृदा में सुधार भी करती है। वर्मी कोंपोस्ट तैयार होने में 50 से 60 दिन का समय लगता है। एक टेट्रा बेड से 600 से 700 किलो ग्राम वर्मी कम्पोस्ट तैयार होती है एवं जूट बेग से 300 से 400 किलो वर्मी कम्पोस्ट तैयार हो जाती है। एक बेड से एक बार में 8 से 10 लीटर वर्मी वॉश प्राप्त होता है, एवं 1 साल में 75 से 80 लीटर वर्मी वॉश एक बेड से प्राप्त होती है। वर्मी कम्पोस्टिंग से प्राप्त वर्मी वॉश भी उपरोक्त सभी फसलों में समान रूप से उपयोगी है। 2 लीटर वर्मी वॉश 200 लीटर पानी में मिलाकर एक एकड़ में एक छिड़काव के लिए पर्याप्त होता है।
केंचुओं से लाभ:-
- केंचुआ कार्बनिक पदार्थों के तीव्र विघटन में मदद करता है।
- मृदा में ठीक प्रकार से अपना सहवास प्राप्त हो जाने के पश्चात यह मृदा के भौतिक, रासायनिक एवं जैविक गुणों में तेजी से सुधार करता है।
- लाभदायक सूक्ष्म जीवों की क्रियाशीलता को बढ़ाता है।
- मृदा की जल धारण क्षमता में वृद्धि करता है।
- मृदा की उत्पादक क्षमता में वृद्धि करता है।
- केंचुओं की मृदा में एक आदर्श संख्या 2 से 4 लाख प्रति हेक्टेयर हो जाने पर मृदा में स्थायी रूप से संरचनात्मक सुधार होता है, जिससे मृदा भुरभुरी एवं पारगम्य हो जाती है एवं मृदा की जलधारण क्षमता 120 सेमी. की गहराई तक बढ़ जाती है।
- केंचुओं से प्राप्त कम्पोस्ट एक स्थायी एवं टिकाऊ मृदा संरचना का निर्माण करती है, जिससे मृदा का वायु एवं जल द्वारा क्षरण काफी हद तक कम हो जाता है।
- केंचुआ खाद के मृदा में प्रयोग से एवं केंचुओं की मृदा में उपलब्धता होने से पोषक तत्वों का मृदा में संतुलन बना रहता है जिससे फसलों में रोग एवं कीटों का आक्रमण कम होता है।
वर्मी कम्पोस्ट खाद निर्माण की प्रक्रिया:-
वर्मी कम्पोस्ट की प्रक्रिया में सर्वप्रथम कार्बनिक पदार्थों का सूक्ष्म जीवों द्वारा आंशिक रूप से विघटन किया जाता है। इस निश्चित अवस्था के बाद आंशिक रूप से विघटित कार्बनिक पदार्थों को केंचुओं द्वारा अपने खाद्य पदार्थ के रूप में उपयोग किया जाता है जिससे पोषक तत्वों से भरपूर कम्पोस्ट खाद का निर्माण हो जाता है। पूर्ण रूप से तैयार वर्मी कम्पोस्ट केंचुओं के मल, अंडों, पूर्ण विघटित कार्बनिक पदार्थ, कई प्रकार के लाभदायक सूक्ष्म जीवों इत्यादि से मिलकर बना होता है।
केंचुआ खाद या वर्मी कम्पोस्ट निर्माण की प्रक्रिया में निम्न चरण सम्मिलित होते हैं:-
- वर्मी कम्पोस्ट खाद निर्माण के लिए उचित केंचुआ प्रजाति का चयन करना।
- सही स्थान का चयन एवं चयनित स्थान की तैयारी करना।
- वर्मी कम्पोस्ट निर्माण के लिए कार्बनिक पदार्थों का चयन करना।
- कंपोस्टिंग पदार्थ का कंपोस्टिंग कल्चर से उपचार करना।
- तैयार वर्मी कम्पोस्ट से केंचुओं को चलनी के माध्यम से प्रथक करना।
केंचुआ प्रजाति का चयन:-
वर्मी कम्पोस्ट निर्माण के लिए कई प्रकार की स्थानीय एवं बाहरी प्रजातियों का उपयोग किया जाता है, परंतु भारतीय दशा में दो प्रजातियों Eisenia foetida और Eudrillus eugineae को अधिक उपयुक्त पाया गया है।
उचित स्थान का चयन एवं तैयारी:-
वर्मी कम्पोस्ट का लगातार एवं आर्थिक उत्पादन करने के लिए निम्न बातों को ध्यान में रखना आवश्यक है:-
- वर्मी कम्पोस्ट तैयार करने के लिए नियमित रूप से कार्बनिक पदार्थ पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध होना चाहिए।
- कंपोस्टिंग बेड किसी छायादार स्थान पर बनाया जाना चाहिए।
- केंचुए की उपयुक्त प्रजाति की आसानी से उपलब्धता होना चाहिए।
- कम्पोस्ट तैयार करने के लिए कार्बनिक पदार्थों के पूर्व उपचार हेतु आवश्यक कल्चर एवं साधन उपलब्ध होना चाहिए।
- वर्मी कम्पोस्ट के रख-रखाव के लिए आवश्यक साधन उपलब्ध होना चाहिए।
वर्मी कम्पोस्ट खाद की अनुशंषित मात्रा:-
- फलदार वृक्षों के लिए उनके आकार के अनुसार 1 से 10 किलोग्राम वर्मी कम्पोस्ट खाद का उपयोग प्रति वृक्ष किया जाना चाहिए।
- सभी प्रकार की फसलों हेतु लगभग 2000 किलोग्राम वर्मी कम्पोस्ट प्रति एकड़ पर्याप्त होती है।
- गमलों में तैयार किए जाने वाले पौधों हेतु जिसमे 8 से 10 किलोग्राम के लगभग मृदा हो उनके लिए 100 ग्राम वर्मी कम्पोस्ट खाद का उपयोग उपयुक्त रहता है।