पौधे के रोगों की नियन्त्रण की विधि अथवा मूल सिद्धान्त

(Methods of Plant Disease Control)

भूमि से पौधों की जड़ों को लगने वाली बीमारियों को निम्न वर्गों में बाँट सकते हैं-

  1. अंकुरण से पहले डेम्बिग आफ व सीलकिंग ब्लाइट इन बीमारियों के लिये पीथियम, फाइटोक्योरा, फ्यूजेरियम, स्केरोशियम व राइजोक्टोनिया कवक जिम्मेदार हैं। ये कवक पौधे के कोमल पैरेनकाइमा को प्रभावित करते हैं। इनसे प्रभावित अंकुरों की मौत भी हो जाती है।
  2. मूल विगलन (Root Rots)- इस वर्ग में फालतू वैस्कूलर टिस्यू पर आक्रमण होता है। मूल गलनः शीर्षगलन (Crown rot) व तना गलन (Stem rot) इसी कारण होते हैं।
  3. वैस्कुलर विल्ट जीवाणु (Pathogens) वैस्कूलर प्रणाली में प्रभाव रखते हैं और विषैले पदार्थ (टोक्सिन्स) व एन्जाइम यहाँ पर पैदा करते रहते हैं। इससे पौधा मुरझा (Wilt) जाता है।
  4. हाइपरट्रोफिक रोग जड़ों में कुछ रोगाणु (Pathogens) कोशिकाओं के विभाजन व वृद्धि को उत्तेजित करते हैं इससे गाल्स (Galls) व फालतू वृद्धि (Over growth) जड़ों में हो जाती है।

मृदा बीमारियों का नियन्त्रण (Control of Soil Sickness)

  1. समय चक या परती भूमि रखकर रोग नियन्त्रण मृदा में फैलने वाली (Soil borne) बीमारियों को लम्बे सस्य-चक्र रखकर व खेत परती रखकर रोगजनकों को नष्ट कर देते हैं। मक्का में ब्राउन स्पोट लगने पर, सस्य चक्र में हेर-फेर करके रोकथाम कर सकते हैं।
  2. परपोषी (Host plant) पौधों को नष्ट करना पादप रोगग्रस्त मुख्य फसल परपोषी के अभाव में, खरपतवार परपोषियों या अन्य जंगली पौधों पर अपना जीवन चक्र बनाये रखते हैं। रोग के उन्मूलन के लिये इस प्रकार से परपोषी पौधों को नष्ट करना आवश्यक है।
  3. कृषि क्रियाओं में परिवर्तन करके खेत को जुताई गहरी करके ग्रीष्म ऋतु में जुताई करके रोपाई या बुआई के समय में परिवर्तन करके, खाद की मात्रा इष्टतम व उचित समय पर प्रयोग करके, उचित समय पर व इष्टतम मात्रा में फसल की सिंचाई करके व जल निकास सम्बन्धी आवश्यकताओं की सुविधा करके रोगजनकों के प्रतिकूल वातावरण तैयार करते हैं। इस प्रकार रोग पर नियन्त्रण प्राप्त कर लेते हैं।
  4. चने का विल्ट रोग व मटर का जड़ सड़न रोग, देर से बुआई करने पर नियन्त्रित होता है। गेहूँ की अगेती बुआई करने पर, रतुआ (Rust) कम लगता है। बाजरे की बुआई 15 जुलाई से पूर्व करने पर अर्गेट रोग का कम प्रकोप होता है।
  5. चने में बिल्ट लगने पर ही गहरी जुताई आवश्यक है तथा फसल को देर से बोना चाहिये। अंडी (Castor) से सीडलिंग ब्लाइट के प्रभाव को रोकने के लिये फसल को नम व निचली भूमियों में नहीं बोना चाहिये। कपास को रूटरोट से बचाव के लिये कपास में मोड की फसल उगाना लाभदायक है।
  6. पौधों के घावों का उपचार पौधों की काट-छांट करते समय उत्पन्न घावों पर रोगजनकों का संक्रमण शीघ्र होने की सम्भावना होती है, ऐसी परिस्थितियों में विभिन्न रसायनों को कटे हुए भागों पर प्रयोग करते हैं। विभिन्न कवकनाशियों (Fungicides); जैसे कापर सल्फेट कैल्शियम कार्बोनेट को लिनोलिन या अलसी के तेल जैसे चिपचिपे पदार्थों में मिलाकर घावों पर लगा देते हैं।
  7. रोगवाहक कीटों (Insect vector) का नियंत्रण जब विभिन्न रोगों के पौधों पर संक्रमण, कीटों द्वारा होता है तब इस प्रकार के कीटों का पता लगाकर उन्हें नष्ट करना आवश्यक होता है।
  8. सफाई (Sanitation)- रोगग्रस्त पौधों के अवशेषों, दूँठों, रोगी शाखाओं व रोगी पत्तियों आदि को एकत्र करके जला देने तथा खेत की गहरी जुताई करके निवेश द्रव्य (Inoculum) को काफी हद तक समाप्त किया जा सकता है।
  9. बीजों का सौर उष्णता एवं गर्म पानी से उपचार (Treatment of seeds with solar Heat & Hot water) कुछ बीमारियों जो बीजों द्वारा फैलती हैं, उनको सूर्य की धूप से रखकर या गर्म पानी (निश्चित सीमा तक) निश्चित समय तक रखकर समाप्त कर सकते हैं। अधिकतर बीजों को 1-4 घण्टे तक पानी में भिगोकर 6-10 घण्टे तक तेज धूप में सुखाना आवश्यक होता है। गर्मियों में मई-जून के महीने में यह उपचार करना अधिक लाभदायक है। जो बीमारियाँ बीजों द्वारा ही फैलती हैं उनके नियन्त्रण की यही सबसे अधिक सफल विधि है।
  10. उर्वरकों का प्रयोग (Use of fertilizers)- धान की पानमुख बीमारी नत्रजन की कमी से लगती है। इस बीमारी से पौधे सूख जाते हैं तथा कल्ले (Tillering) भी कम निकलते हैं। नत्रजन के उर्वरकों का प्रयोग करके इसकी रोकथाम कर सकते हैं। सेम में फैलने वाली हर्ट रोट नामक, बीमारी बोरोन की कमी से फैलती है। 20-25 किया बोरेक्स प्रति हैक्टेयर की दर से प्रयोग करने पर इस बीमारी की रोकथाम कर सकते हैं। ज्वार में रेड लीफ स्पोट लगने पर भूमि में खाद डालना आवश्यक है। धान में खेरा रोग जस्ते की कमी से लगता है।
  11. सिंचाई प्रवन्ध:- आलू की फसल में कन्द बनते समय सिचाई करने से, आलू की स्केव बीमारों का प्रकोप कम होता है। अनेक जैविक मृदा सुधारकों के प्रयोग से भूमि में जड़ सड़न की लगभग तीस बीमारियों के रोगाणु नष्ट होते हैं। नाइट्रोजन उर्वरकों के प्रयोग से मृदा समु 8.5 से ऊपर पहुंचती है जो कि रोगाणुओं को नष्ट करने में सहायक है। गेहूँ की ब्राउनिंग जड़ सडून रोग का नियन्त्रण बुआई के समय अमोनियम फॉस्फेट का प्रयोग कर किया जा सकता है। कपास की विल्ट व अनेक मृदा से उत्पन्न होने वाले रोग, भूमि में पोटाश उर्वरकों का प्रयोग कर, नियन्त्रित किये जा सकते हैं।
  12. सौर ऊर्जा का प्रयोग रोगनाशक के रूप में पौधों की बीमारियों की रोकथाम के लिये मृदा का सूर्य विकिरण उपचार (Soil solarization or Solar heating of soil)- भूमि पर प्रतिवर्ष लगातार एक ही प्रकार की फसलें उगाना मुख्यतया, भूमि में, बीमारियों के जीवाणुओं को बढ़ाते हैं। असंख्य बीमारी के जीवाणु (Pathogens) भूमि में पनप कर पौधों की वनस्पति परः बीमारियों पैदा करते हैं। जैसे-डाउनी मिल्ड्यू, चूर्णी फफूंदी, बष्ट (अनेक प्रकार के), कंड्आ (Smut) व अन्य फफूंद, मृदाजनक रोग फसल पर आक्रमण करते हैं। प्लास्टिक सीट (0.03 mm.) की मल्चिंग खेतों में करके भूमि में 5-10 सेमी गहराई तक मिट्टी के तापक्रम को सौर ऊर्जा द्वारा 6.9°C तक बढ़ा कर और इसके साथ साथ खेतों में पानी दिया जाना चाहिए। वाष्पन के द्वारा छोटी-छोटी पानी को बूंदे, प्लास्टिक सोट की निचली सतहों पर जमा हो जाती हैं, वे सूर्य की किरणों को वापस नहीं जाने देतीं व बूंदों द्वारा अवशोषित ऊर्जा मिट्टी का ताप बढ़ाती है। फलस्वरूप रोग उत्पन्न करने वाले कवक व कीटाणु काफी सीमा तक कम हो जाते हैं।
  13. बीमारियों का नियन्त्रण एवं उपज में वृद्धि मृदा में सूर्य के ताप उपचार से टमाटर, बैंगन, आलू की वर्टीसिलियम बीमारी, प्याज व आलू की राइजोक्टोनिया बीमारी, कपास, टमाटर, प्याज की फ्यूजेरियम बीमारी, गाजर व बैंगन की औरोबंकी आदि बीमारियों नियन्त्रित होती हैं व नियन्त्रित क्यारियों की अपेक्षा विभिन्न फसलों में 35% से 300 तक अधिक उपज प्राप्त होती है।
    मुदा ताप उपचार से बीजगलन, डैम्पिग आफ, मूल विगलन, कालर रोट, विल्ट, तना सड़न आदि बीमारी नियन्त्रित की जा सकती है।
  14. बीपारियों का जैविक नियन्त्रण चीजों के ऊपर, बुआई पूर्व ट्राइकोडरमा (T. harzianum, T Viride, T. koningii) को परत चढ़ाने से, टमाटर आदि में पीथियम डेम्पिंग आफ, स्केरोटियम जड़ गलन आदि बीमारियों को रोकथाम सफलतापूर्वक की जाती है।
  15. रोग अवरोध जातियों का बोना (Sowing of disease resistant Varieties)- फसल को रोगों के संक्रमण से बचाने के लिये, रोग अवरोधी जातियों को ही खेत में बोना चाहिये। वैज्ञानिक विभिन्न फसलों की अनेकों रोगरोधक जातियों का विकास कर रहे हैं। ये नई फसलों की किस्में अनेकों परीक्षणों से गुजरने के बाद किसानों को वितरित की जाती हैं।
  16. रसायनों का प्रयोग जब पादप रोग के रोगजनक बीजों पर चिपके होते हैं या मृदा कणों पर पाये जाते हैं या पौधों पर फैलते रहते हैं तो विभिन्न रसायनों का प्रयोग धूलि (Dust), द्रव (Solution) या धूम्र (Fumigation) के रूप में, परिस्थितियों के अनुसार करते हैं।


विभिन्न रसायनों को जो कि रोगों को नष्ट करने के काम में आते हैं, निम्न प्रकार वर्गीकृत करते हैं-
(i) ताँबायुक्त रसायन इस वर्ग में बोडों मिश्रण, बर्गण्डा मिश्रण, ब्लाइटोक्स, पेरेलोन, पेरेनाक्स, फाइटोलान व क्यूपरासन आदि रसायन हैं।
(ii) गन्धकयुक्त रसायन- इस वर्ग में जाईराम, फेरबान, जिनैब, मिनेब, नुवान, धीरम, टूलिसन, सल्फाईनेट व लिमसुल आदि रसायन सम्मिलित हैं।
(iii) पारायुक्त रसायन इस वर्ग में एग्रोसन जी० एन०, सेरेसन, ऐरेटान व नोमरसन आदि रसायन प्रमुख हैं।
इसके अतिरिक्त पौधों के रोगनाशक कुछ प्रतिजैविक पदार्थ जैसे आरिओफगन व स्ट्रेप्टोसाईक्तिन आदि भी प्रयोग किये जाते हैं।

सूर्य विकिरण से भूमि को गर्म करने का सिद्धान्त-

  • पारदर्शी पॉलिथीन चादर (पतली 0-25-0-40 मिमी) का मल्य के रूप में प्रयोग, सूर्य विकिरण को, भूमि के कणों तक पहुंचाता है और भूमि गर्म हो जाती है।
  • मृदा आच्छादन (Soil mulching), अधिक गर्मी के समय करना चाहिये ताकि सूर्य विकिरण को सुखा जा सके। आच्छादन के समय भूमि को नम रखें।

रसायनों का प्रयोग निम्नलिखित रूपों में करते हैं

(1) कवकनाशियों द्वारा बीज उपचार (Seed treatment with fungicides)-

बीजों को खेत में बोने से पहले, कवकनाशियों से उपचारित किया जाता है। अधिकतर राज्यों में सरकार इस प्रकार से उपचारित बीजों का ही वितरण करती है। इस प्रकार के उपचार से धान की ब्लास्ट, फुटरोट ब्लाइट व जई की कवर्ड स्मट, नेट ब्लोज अलवी, रूटरोट, ज्वार की प्रेनस्मट व हैंडस्मट, अलसी की रस्ट, विल्ट व आल्टरनेरिया ब्लाइट, मूँगफली की रूटरोट व मटर आदि की फुटरोट तथा ब्लाइट रोगों की रोकथाम की जाती है। बीज शोधन की विधियाँ सरल हैं। सूखे बोये जाने वाले बोजों (जैस-गेहूं व जौ, सूखे खेत में कुंडों में बोया जाने वाला धाने) में कैप्टान 20 ग्राम प्रति किलोग्राम अथवा धीरम 2.5 ग्राम प्रति किलो बीज में भली-भाँति मिलाते हैं। चूंकि उत्तम बीज शोधन के लिये प्रत्येक बीज पर रोगाणुनाशक रसायन की एक परत छा जाती है, जो आवश्यक है, अतः थोड़े बीज को हिलाकर मिलाने के लिये मिट्टी के घड़े अथवा अधिक मात्रा के लिये बीजशोधक यन्त्र जो विकास खण्डों में कृषि रक्षा लघु केन्द्रों पर उपलब्ध होते हैं, का उपयोग आवश्यक है। जहाँ पर अनावृत कंडुवा (लूज स्मट) रोग के लगने की आशंका हो या पूर्व वर्ष में लगा हो, ऐसे बीज को बायोफेनेट मिथाइल (टोपसिन एम) या कार्वेण्डाजिम या कारवाक्सीन (विटावैक्स) के दो ग्राम को प्रति किलोग्राम बीज में मिलाकर बोना चाहिये। यह फफूंदीनाशक बीज के अन्दर की फफूंदी को भी नष्ट कर देता है।
यदि बीज को पहले पानी से भिगोकर बोना है, अथवा पानी से भरे खेत में बोना है (विशेषतः धान) तो बीज को जिस पानी में भिगोया जा रहा है, उस पानी में 10 ग्राम प्रति 10 लीटर पानी की दर से सोसनवेट नामक रसायन या पारायुक्त घुलनशील रसायन 6 प्रतिशत या 3 प्रतिशत का घोल बनाकर लगभग 18 लीटर इस प्रकार से बने घोल में 10 किलोग्राम बीज रात भर भिगो लेते हैं। मक्का, ज्वार, बाजरा, जैसे बीजों के लिये पीरम 75 प्रतिशत अथवा केप्टान ४० प्रतिशत नामक रसायन उपयोगी है। इनके बीज शोधन करने के लिये वांछित मात्रा, 200 ग्राम प्रति 100 किलोग्राम बीज में धीरम तथा 180 ग्राम कैप्टान का लगभग एक लीटर पानी में गाढ़ा घोल बनाकर अथवा सूखा ही प्रति 100 किलो बीज के साथ मिलाया जाता है। बीज में रसायन भली प्रकार मिलाने के लिये घड़े अथवा बीजशोधक मशीन का उपयोग करना लाभप्रद है। दलहनी, तिलहनी व सब्जी के बीजों का शोधन, कैप्टान आदि से अयधा थायोफिनेट मिथाइल कार्बनडाजिम कार्बोक्सीन आदि से किया जाना चाहिये। इन रसायनों के दो ग्राम को एक किलोग्राम बीज में मिलाकर आलू का बीज शोधन कार्वेण्डाजिम (बाविस्टीन), का पारायुक्त 3 या 6 प्रतिशत रसायनों 250 ग्राम 100 लीटर पानी में घोलकर आलू को दो मिनट तक भिगोकर करना चाहिये। शोधित आलू को छाया में सुखाया जाना चाहिये।
बीजशोधन एक सस्ती, सरल एवं गुणकारी कृषि रक्षा विधि है, जो प्रत्येक बीज के लिये आवश्यक रूप से अपनाई जानी चाहिये।

(2) कवकनाशी रसायनों का धूल के रूप में बुरकाव (Dusting of fungicides)-

जो रोग हवा के द्वारा फैलते हैं उनकी रोकथाम के लिये विभिन्न रसायनों की धूलि को डस्टर नामक उपकरण की सहायता से खेत से छिड़क देते हैं। जो व गेहूँ की पाउडरी मिल्ड्यू व स्टैम रस्ट, जई की स्टैम रस्ट व अनेकों फसलों को पाउडरी मिल्ड्यू नामक रोगों के नियन्त्रण के लिये 15-20 किलोग्राम सल्फर की धूलि का बुरकाव शान्त वायु में करना चाहिये।
(3) कवकनाशी रसायनों का घोल के रूप में छिड़काव (Spray of fungicides solution)- दवाइयों का धूल के रूप में छिड़काव न करके घोल के रूप में छिड़कना अधिक लाभकारी रहता है। क्योंकि रसायनों का घोल, पौधों के अंगों पर अच्छी प्रकार चिपक जाता है। बैक्टीरियल विल्ट नामक रोगों को नष्ट करने के लिये 7.5 ग्राम स्ट्रप्टोसाइक्लीन व 250 ग्राम ताँबायुक्त रसायनों को आवश्यकतानुसार 400-600 लीटर पानी में घोलकर, प्रति हैक्टेयर में छिड़कते हैं। रसायनों का यह छिड़काव 15, 25, 35, 45 व 60 दिनों के बाद करना चाहिये।
गेहूँ में गेरुई (Rust) नामक रोग लग जाने पर जिनेब या जिंक कार्बोनेट की 3-5 किलोग्राम मात्रा एक हजार लीटर पानी में घोलकर, खेत में पन्द्रह-पन्द्रह दिन के अन्तर पर तीन बार छिड़कना चाहिये।
मक्का की डाउनी मिल्ड्यू के लिये 1.5 किया जिक कार्बोनेट को एक हजार लीटर पानी में घोलकर
प्रति हैक्टेयर छिड़कना चाहिये।

(4) कवकनाशियों से मृदा का उपचार (Soil treatment with fungicides)-

यद्यपि कवकनाशियों के द्वारा, मृदा का उपचार करना काफी खर्चीला होता है फिर भी कुछ विशेष परिस्थितियों में कैप्टान, वैपाम, थिरम डेक्सान, आक्सेथीन, क्लोरोनेब व बेनोमिल नामक रसायनों का प्रयोग, मृदा में रोगजनकों को नष्ट करने के लिये किया जाता है।

फसल की कटाई के बाद उत्पन्न बीमारियों का नियन्त्रण

फसल की कटाई के बाद विशेष रूप से सब्जियों व फलों के ऊपर भी रोगों का संक्रमण हो जाता है। भंडार में उपज के रोग नियंत्रण के लिये रसायनों का प्रयोग करने से, अधिकांश यौगिक उपज पर अपना विषैला प्रभाव छोड़ते हैं तथा कुछ रसायन, उपज को क्षतिग्रस्त भी कर देते हैं। भण्डारों में उपज को रोगों से रक्षा के लिये विशेष कवकनाशी तैयार किये गये हैं। इनके हल्के घोल का प्रयोग किया जाता है।
सल्फर डाइऑक्साइड (SO₂) आदि रसायनों का प्रयोग भंडारों में गैस के रूप में रोगों के संक्रमण को रोकने के लिये करते हैं। कुछ रसायनों को सब्जियों को व फलों की पेटियों पर भी छिड़‌का जाता है। भंडारों में उपज की अधिक मात्रा को रोगों के आक्रमण से बचाने के लिये बोरेक्स, नाइ‌ट्रोजन ट्राइक्लोराइड, सोडियम कार्बोनेट, थायोबैनडेजोल नामक रसायनों का प्रयोग किया जाता है।